(गतांक से आगे)
चांदनी-- अरे! तुम कब आये?
आनंद-- थोड़ी देर पहले । तुम अँधेरे में बैठी थी तो मैंने सोचा शायद तुम्हारी तबियत ठीक नहीं । इसलिए नाश्ता बना कर ले आया।
चांदनी-- अच्छा नहीं किया। दफ्तर से आते-आते जुट गए।
आनंद-- तुम भी तो दफ्तर से ही आई हो।
चांदनी-- तुमसे पहले आ गयी थी।
आनंद-- ओह, कम आन चांदनी! वैसे क्या बात है? तुम थकी- थकी सी दिखती हो। कोई विशेष बात?
चांदनी-- विशेष तो नहीं, यूँ ही एक छोटी सी बात है।
आनंद-- क्या?
चांदनी-- आज विजय से भेंट हुई, एक पेशेंट के रूप में।
आनंद-- वही विजय? तुम्हारे बचपन का दोस्त?
चांदनी-- हाँ।
आनंद-- क्या हुआ उसे?
चांदनी-- कार एक्सीडेंट हुआ है। राइट साइड बहुत ज्यादा इन्ज्योर्ड है। बांह डिस्लोकेट हो गयी है, घुटने में फ्रैक्चर है, दो पसली क्रैक कर गयी है, सर में भी चोट है। कुलमिला कर पोजीशन थोड़ी ठीक नहीं है।
आनंद-- ओह , तब तो चिंता की बात है । कर में अकेले थे ? साथ में कोई...
चांदनी-- पत्नी है। उसे हल्की चोटें हैं।
आनंद-- तुमने अच्छी ट्रीटमेंट तो दी है ना?
चंदनी-- अपनी और से तो हर संभव चेष्टा है।
आनंद-- चांदनी, तुम कभी यह मत सोचना कि तुम उसका स्पेशल केयर लोगी तो मैं कुछ अदरवाइज लूँगा।
चांदनी-- मैं जानती हूँ आनंद।
आनंद-- तुम उनकी अच्छी देख भाल करना। उन्हें यह महसूस नहीं होना चाहिए कि तुम बदल गयी हो, या तुम्हारे मन में कोई रंजिश है। आदमी बुरे दिनों में ही किसी के काम आता है।
चांदनी-- (कृतज्ञ स्वर में) थैंक यूं आनंद! तुमने मुझे एक भार से मुक्त कर दिया। मैं डर रही थी , कहीं मुझसे तुम्हारे प्रति कोई अपराध तो नहीं हो रहा।
आनंद-- (हंस कर) डोंट बी सिली चाँदनी। मेरा विश्वास इतना छोटा नहीं।
चांदनी-- आई लव यूं आनंद!
आनंद-- आई नो इट डार्लिंग!
चांदनी-- तुम मिलोगे उससे?
आनंद-- जरूर। लेकिन पहले उन्हें जरा ठीक हो जाने दो। अचानक तुम्हारे साथ मुझे देख कर उन्हें शायद अच्छा ना लगे।
चांदनी-- हो सकता है। वह पहले भी ऐसा ही था, संभव है अब भी नहीं बदला हो। (मूड बदल कर) छोड़ो हटाओ। काफी वक्त हो गया। बोलो रात के खाने में क्या खाओगे?
आनंद-- दैट्स लाइक अ गुड वाइफ।
(दोनों हंस पड़ते हैं)
(दृश्य परिवर्तन)
नर्स-- गुड मार्निंग डाक्टर।
चांदनी-- गुड मार्निंग सिस्टर। हाउ इज योर पेशेंट?
नर्स--- फाइन। वेरी को- ओपरेटिव।
चांदनी--(हलके से हंस कर) गुड।
कल्पना-- नमस्कार।
चांदनी-- नमस्कार। कैसे हैं आपके हसबैंड?
कल्पना-- पहले से काफी ठीक हैं। टांग कि प्लास्टर की वजह से थोड़े तंग हैं।
चांदनी-- थोड़ी परेशानी तो होगी ही। सो रहे हैं क्या?
कल्पना-- नहीं, जाग रहे हैं। मैं आपकी आवाज सुन कर निकल आई थी। आइये ना। (थोडा सा विराम)
चांदनी-- हैलो विजय!
विजय-- (विस्मय से) तुम?
चांदनी-- हाँ मैं। क्यों? कल्पना जी ने बताया नहीं था क्या?
कल्पना-- नहीं। मैंने बताया नहीं था। मैंने सोचा, आपको अचानक सामने देख कर जो ख़ुशी होगी, उससे इन्हें वंचित क्यों रखा जाये?
विजय-- सिली। ओरतें कितनी भी उम्र की क्यों ना हो जाएँ, उनका बचपना नहीं जाता।
चांदनी-- ओरतों का यह बचपना यदि ख़त्म हो जाये तो पुरुषों के जीवन से ख़ुशी का एक बड़ा जरिया ख़त्म हो जायेगा । वैसे तुमने मुझे मेरी आवाज से भी नहीं पहचाना था?
विजय-- नहीं। मेरा इस ओर ध्यान नहीं गया था। मैंने कभी आशा ही नहीं की थी कि तुमसे कभी ऐसे भी भेंट होगी।
चांदनी-- इसका मतलब तुम मुझे बिलकुल भूल गए थे। इट्स अ गुड साइन फॉर योर फैमिली लाइफ।
विजय-- बहुत जल्दी निष्कर्ष पर पहुँच गयी?
चांदनी-- यह एक सफल डाक्टर होने की निशानी है। वैसे तबियत कैसी है तुम्हारी? कैसा फिल कर रहे हो? कहीं पेन तो नहीं महसूस कर कर रहे हो ?
विजय-- थोड़ा। चोट है तो थोड़ी पीड़ा तो होगी ही ना?
चांदनी-- लेकिन एक्सीडें हुआ कैसे? तुम तो बहुत अच्छे ड्राइवर हो?
विजय-- गाडी स्पीड में थी। एक साइकिल वाले को बचाने में सड़क के किनारे उतर गयी ओर एक पेड़ से टकरा गयी। वैसे तुम कैसी हो?
चांदनी--(थोड़ा हंस कर) बहुत देर बाद ख्याल आया? वैसे मैं ठीक हूँ ओर मैंने कोई एक्सीडेंट नहीं किया है। (सब हंस पड़ते हैं) ये अच्छा हुआ कल्पना जी कि आप बिलकुल बच गयीं।
कल्पना-- मैं तो इनके ऊपर लद गयी थी, इसलिए मुझे कुछ नहीं हुआ। बस सर स्टेयरिंग से टकरा गया था इसलिए सर में थोड़ी चोट आ गयी। अ ..विजय, मैंने नारंगी की फांके निकाल दी हैं , आप खा लीजिये।
विजय-- चाँदनी, तुम जैसे निकला करती थी , वैसे ही निकाल दो।
चांदनी-- अरे!(असमंजस वाली हंसी) ।
कल्पना-- कैसे निकालती थीं भई?
चांदनी-- कुछ ख़ास नहीं, फांकों के छिलके उतार कर दाने निकाल दिया करती थी। वैसे ही निकाल दीजिये। खाने में सुविधा होगी। अरे राम! बहुत वक्त हो गया। मैंने वार्ड का राउण्ड तो लिया ही नहीं।
कल्पना-- लगता है सीधे यहीं चली आईं थीं।
चांदनी--हाँ, फिर बातों में वक्त का पता ही नहीं चला। अच्छा मैं चलती हूँ। कोई ट्रबुल हो मुझे खबर कीजियेगा। वैसे तो मैं खुद ही आती रहूंगी। अरे, आप क्यों उठ रहीं हैं?
कल्पना-- आपको छोड़ दूं। नर्स कहाँ चली गयी?
चांदनी-- इधर ही कहीं होगी, मैं भेज देती हूँ।
कल्पना-- चांदनी जी, एक प्रार्थना थी आपसे!
चांदनी-- प्रार्थना की बात है, कहिये ना?
कल्पना-- जब तक वो यहाँ हैं, आप उनकी देख -भाल डाक्टर चांदनी की तरह नहीं, सिर्फ चांदनी की कीजिये। मुझे उम्मीद है, इससे वो जल्दी अच्छे हो जायेंगे। आप समझ रहीं हैं ना?
चांदनी-- (धीरे से) समझ रही हूँ। और शायद वो भी जो आपने नहीं कहा। (कल्पना की लंबी सांस)
(दृश्य परिवर्तन)
आनंद-- आ तो गया हूँ मैं चांदनी लेकिन पता नहीं मिस्टर विजय मुझे देख कर कैसा फिल करें?
चांदनी-- तुमसे मिल कर किसी ने आजतक बुरा फिल किया है क्या?
आनंद-- सो तुम्हारे विजय बाबु कुछ अलग किस्म के व्यक्ति हैं ना।
चांदनी-- यह तुम कैसे जानते हो?
आनंद-- इसके लिए एक ही पहचान काफी है।
चांदनी-- कौन सी?
आनंद-- तुम्हारे पहलू में मेरा पाया जाना । (हंस पड़ता है)
चांदनी-- (नाराज हो कर) आनंद!
आनंद-- नाराज हो गयी? अच्छा बाबा, अब नहीं बोलूँगा।
चांदनी-- रूम नंबर २१। यही है उसका कमरा। पता नहीं सो रहा है या जाग रहा है। (दस्तक का स्वर) कल्पना जी...
कल्पना--(दूर से नजदीक आती आवाज) आइये। आइये ना। खुला हुआ है।
चांदनी-- सब ठीक है?
कल्पना-- इन्ही से पूछ लीजिये।
चांदनी-- हलो विजय। कैसे हो?
विजय-- पहले से ज्यादा बेहतर।
चांदनी-- इनसे मिलो, मेरे हसबैंड, मिस्टर आनंद। और आनंद, ये हैं विजय।
आनंद-- हलो । बहुत ख़ुशी हुई आपसे मिल कर। मैं आपके लिए बुके लाया हूँ, अपने बगीचे के फूलों से तैयार कर के। उम्मीद है आपको पसंद आएगा।
विजय-- धन्यवाद।
चांदनी-- इनसे मिलो आनंद, कल्पना जी , विजय की पत्नी।
आनंद-- ओह, नमस्कार। मैं तब से सोच रहा था विजय जी को अच्छा करने के लिए कहीं अलग से तो इतनी सुन्दर नर्स नहीं भेजी गयी है?
कल्पना--(हंस कर)धन्यवाद। बाते अच्छी कर लेते हैं आप।
आनंद-- आपको पसंद आई? चलिए इसी बात पर आपको कुछ देने का मन कर रहा है। लेकिन क्या दूं? विजय जी, आपके गुलदस्ते से एक फूल ले सकता हूँ?
विजय-- जरूर। आप पूरा भी ले सकते हैं।
आनंद-- नहीं, पूरा तो नहीं, सिर्फ एक लूगा। कल्पने जी , यह एक फूल आपे लिए।
कल्पना-- शुक्रिया, लेकिन मैं इसे रखूं कहाँ?
आनंद-- मैं एक अच्छी जगह बताऊँ?
कल्पना-- जरुर।
आनंद-- अपने बालों में लगा लीजिये। दिखियेगा, यह जो कमरा बीमार बीमार सा लग रहा है ना, एकदम से मुस्कुरा उठेगा।
चांदनी--(धमकी भरे स्वर में) आनंद, डोंट बी रोमैटिक।
आनंद-- सारी, मैं तो भूल ही गया था कि मेरी बीवी पास ही खड़ीहै। (चांदनी, कल्पना और आनंद की हल्की हंसी)
कल्पना-- बड़ी जल्दी भूलते हैं आप?
आनंद-- नहीं तो, जल्दी नहीं भूलता। वो तो बस आपको देख कर भूल गया था। मिस्टर विजय, आप नाराज तो नहीं हो रहे है ना?
विजय-- नहीं। अच्छा ही है , इन्हें भी अपने मन के लायक बातें करने वाला मिला। वैसे आप कांट्रेक्टर है क्या ?
आनंद-- जी नहीं, मैं इंजिनियर हूँ।
विजय-- चांदनी से कहाँ मुलाकात हो गयी आपकी?
आनंद-- यहीं, इसी हास्पिटल में। लीवर की बिमारी ले कर आया था। इस बीमारी के ठीक होते- होते दिल की बीमारी लग गयी।
चांदनी--(टोकते हुए) आनंद!
आनंद-- सारी। मैं बोर तो नहीं कर रहा आपको?
विजय-- नहीं, मैं सुन रहा हूँ आपको।
आनंद-- लेकिन मैं अब चलूँगा। आफिस को अच्छी देर हो चुकी है। इश्वर करे आप जल्दी स्वस्थ हो जाएँ। अच्छा कल्पना जी , चलता हूँ। बाई डियर।
चांदनी-- बाई।
कल्पना-- नमस्कार।
आनंद-- नमस्कार। सी यू अगेन।
(थोड़ी देर चुप्पी)
विजय-- तुमने बताया नहीं था।
चांदनी-- तुमने पूछा नहीं था।
(शेष फिर)
3 comments:
too big
kahani ke pahle part ko bhi padha aur uske baad kahani ka ye part bhi padha .......
Archna ji ... pyaar mein jalan bahut swabhavik hai ....magar uska ghutan ban jana aur hamesha ke liye alag ho jaane ka aapne sunder chitran kiya hai .......
agle ank ka intezaar rahega .....
Kalpna aur Aanand ka chritra bahut achcha laga ..... aise khule dil ke jeevan saathi kismat walon ko milte hain
अर्चना जी , दोनो भाग रोचक ।
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