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Wednesday, June 2, 2010

(गतांक से आगे)

विजय-- तुमने बताया नहीं था।
चांदनी-- तुमने पूछा नहीं था।
विजय-- मैंने सोचा नहीं था।
चांदनी-- आश्चर्य है तुमने कैसे नहीं सोचा था।
विजय-- क्या देखा तुमने इस आदमी में?
चांदनी-- जिन्दादिली, जिंदगी को जी लेने कि चाहत।
विजय-- जिंदगी को जीने का यही तरीका पसंद आया तुमको?
चांदनी-- बड़ा सहज है। विदाउट एनी कप्लिकेशन ।
विजय-- तुम अपने आप को धोखा दे रही हो। समझ नहीं पा रही हो अपने आप को।
चांदनी-- कभी अपने विषय में सोचा है? अरे कल्पना, आप कहाँ जा रही है? विजय?
विजय-- जाने दो उसे। वह सब जानती है।
चांदनी-- (तीखे स्वर में) क्या यह भी जानती है कि तुम अपनी पूर्व प्रेमिका के साथ उसके पति को सहन नहीं कर पा रहे हो? जबकि तुम खुद विवाहित हो?
विजय-- तुम गलत समझ रही हो। मैं सिर्फ...
चांदनी--(बीच में ही ) तुम अपने आप को गलत समझ रहे हो। तुम यह सोचे बैठे थे कि चांदनी तुमसे अलग हो कर अकेली होगी। तुम्हारे यादों के सहारे जिंदगी गुजार रही होगी। है ना? तुम्हें यह देख कर चोट पहुंची है कि मेरी तुमसे अलग एक स्वतंत्र जिंदगी है।
विजय-- मुझसे अलग तुम्हारी कोई स्वतंत्र जिंदगी नहीं है। विवाह कर लेने से क्या होगा, तुम आज भी मुझसे प्यार करती हो।
चांदनी --यह तुमने कैसे सोच लिया?
विजय-- क्योकि तुम आज भी मेरा उतना ही ख्याल रखती हो। मेरे लिए तुम्हारे पास आज भी उतनी ही तत्परता है।
चांदनी-- यह मेरी सदभावना भी हो सकती है। पुरानी पहचान का ख्याल भी हो सकता है। नहीं विजय, मैं तुमसे प्यार नहीं करती। अगर प्यार करती तो अपने पति को तुमसे मिलाने नहीं लती। (मैं सोचती थी कि इतने दिनों में तुम बदल गए होगे, लेकिन नहीं, तुम आज भी वहीँ हो जहाँ मैं तुम्हें छोड़ गयी थी। तब तुम मेरे साथ एक मित्र को देख कर पेशेंस लूज कर गए थे, आज मेरे साथ मेरे पति को बर्दास्त नहीं कर पा रहे हो।
विजय-- देखो चांदनी॥
चांदनी-- नहीं, तुम्हारा ज्यादा टेंशन में आना उचित नहीं है। तुम आराम करो , मैं देखती हूँ कल्पना कहाँ हैं।

(थोड़े विराम के बाद)
चांदनी-- कल्पना, आप यहाँ खडी हैं?
कल्पना-- हाँ, मैंने सोचा मेरी उपस्थिति से आपलोग डिस्टर्ब होंगे।
चांदनी-- शायद हमदोनो के कारण आप डिस्टर्ब हो गयी हैं
कल्पना-- मेरे डिस्टर्ब होने का तो प्रश्न ही नहीं होता है, क्योकि जिस घर में मैं रहती हूँ, उस घर की बुनियाद आप ही हैं।
चांदनी-- और अब शायद उस घर में आप अकेली रहती हैं।(कल्पना की लंबी साँस) विश्वास कीजिये मैं आपके अकेलेपन को बढ़ाने नहीं आई हूँ। सामर्थ्य होती तो कम करने की चेष्टा जरूर करती।
कल्पना--( विषाद युक्त हंसी के साथ) मेरे खुद की चेष्टाएँ तो मेरे अकेलेपन को कम नहीं कर सकीं, शायद आपकी कर पाती।
चांदनी-- एक व्यक्तिगत प्रश्न पूछूं?
कल्पना-- पूछिए।
चांदनी-- आपकी लव मैरिज है या अरेंज?
कल्पना-- लव।
चांदनी-- फिर यह अकेलापन क्योंकर आया कल्पना ?
कल्पना-- मैं विजय के जीवन में आपका विकल्प बन कर आई हूँ चांदनी। अब भी आपको मेरे अकेलेपन के लिए पूछना है?
चांदनी--(स्तब्ध स्वर में) नहीं। लेकिन आपने यह रिश्ता स्वीकार क्यों किया?
कल्पना-- तब नहीं जानती थी कि किस रिश्ते को जीने जा रही हूँ। विजय की विद्वता , उनका गंभीर व्यक्तित्व , किसी को समझने की , उसकी फीलिंग्स को महसूस करने की उनकी क्षमता, और इन सब के ऊपर 'मैं तुम्हें प्यार करता हूँ' इस वाक्य क विशाल और गहरा जाल। फिर कहाँ अवकाश था आगे की जिंदगी को सोचने की व्यवहारिकता बरत सकने का। (लम्बी साँस) वो तो जब जिंदगी के सारे रास्ते बंद कर इनके साथ चली आई, तो जाना , मैंने सिर्फ एक खाली जगह भरी है, अपनी जगह बनाई नहीं है।
चांदनी-- विजय ने बताया नहीं था?
कल्पना-- बताया था। लेकिन यह नहीं बताया था कि वो कल्पना में चांदनी को ढूंढ रहे हैं। आप सोचती हैं , यह हमारी पहली मुलाकात है। आप जरूर मुझसे पहली बार मिल रही हैं, लेकिन मैंने तो आपको बहुत बार देखा है। विजय की आखों में, उनकी कविताओं में, और बहुत बार विजय के पहलू में खुद को ही चांदनी के रूप में देखा है।
चांदनी-- कल्पना बस, बस अब और नहीं।
कल्पना-- (दुःख की हल्की हंसी ) जो आप सुन नहीं सकतीं , उसे मैं जिया करती हूँ। जानती हैं यह एक्सीडेंट कैसे हुआ था? हमलोग एक लॉन्ग ड्राइव पर निकले थे। रास्ते में इन्होंने कहा' चांदनी को बड़ा शौक था इस तरह के लॉन्ग ड्राइव पर जाने का लेकिन मैं हमेशा ही टालता रहा। शायद धैर्य की सीमा कहीं से दरक गयी थी, मेरे मुंह से निकल गया, मैं उतर जाऊं गाड़ी से? मेरी उपस्थिति में चांदनी के ख्याल के साथ ड्राइव करने में असुविधा होगी। बस, इतना ही पर्याप्त था। पत्नी को पास बिठा कर प्रेमिका की बात करना गुनाह नहीं था, लेकिन मेरा यह विरोध जरूर गुनाह था। तुम मिन माइंडेड हो, जो व्यक्ति है ही नहीं, उससे ईर्ष्या करती हो, तुम क्या सोचती हो तुम चली जाओगी तो मैं नहीं जी सकूँगा? मैं पर्याप्त हूँ अपने लिए। मुझे किसी सहारे की जरुरत नहीं। और ना जाना क्या- क्या। और प्रत्येक वाक्य के साथ गाड़ी की बढ़ती स्पीड। कब तक संभलती !
चांदनी-- एक बात कहूं? कहनी नहीं चाहिए फिर भी।
कल्पना-- क्या?
चांदनी-- इतना सब कुछ झेलने की विवशता क्या है?
कल्पना-- मैंने इंटर - कास्ट मैरेज की है चांदनी। कहाँ जाऊँगी मैं? फिर इन सब के बावजूद मैं इन्हें प्यार करती हूँ। इन्होंने भले ही मुझे आपका विकल्प बनाया लेकिन ये तो मेरे लिए किसी का विकल्प नहीं हैं।
चांदनी--(लंबी सांस) शायद अब आपको किसी का विकल्प बनने की जरूरत नहीं पड़े।
कल्पना-- आप मेरी वकालत करेंगी?
चांदनी-- नहीं। मैं आपकी वकालत कर के आप को हल्का नहीं करुँगी। हाँ, मेरी स्थिति शायद आपकी वकालत कर दे।
कल्पना-- मतलब?
चांदनी-- आनंद के साथ मेरी सुखी जिंदगी शायद आपको भी सुखी कर जाए।
कल्पना-- शायद।
चांदनी-- मुझे दुःख ही कल्पना, मैंने अनजाने में आपकी जिंदगी नष्ट कर की है और आपके लिए कुछ कर भी नहीं सकती सिवा ईश्वर से प्रार्थना के।
कल्पना-- (धीरे से) शायद यही मेरे काम आ जाये।


(दृश्य परिवर्तन)

चांदनी--(स्वगत भाषण) तो ऐसे थे विजय तुम। इतने आत्मकेंद्रित , और शायद इतने ही स्वार्थी भी। मैंने तो तुम्हें ऐसा नहीं जाना था विजय। क्या किसी प्रिये व्यक्ति को पहचानने के लिए किसी दूसरे की आखें जरुरी हैं? शायद। क्योकि मेरी मोहित दृष्टि कोतो तुम बड़े ऊँचे ,बड़े आदरनिये लगा करते थे। बहुत- बहुत तठस्थ हो कर देखा तो थोड़े अहंकारी दिखे , बस। लेकिन आज कल्पना की आँखों से देखा तो तुम तो बड़े छोटे दिखे विजय। इतने छोटे की तुम्हारा कद कल्पना से भी से छोटा हो गया। तुमसे तो मेरा आनंद न जाने कितना ऊँचा है। बड़ा अच्छा हुआ जो तुमसे एक मुलाकात हो गयी। नहीं तो न जाने कब तक मैं इस अफ़सोस में जीती कि कहीं तुम्हें छोड़ कर मैंने कोई गलती तो नहीं की? विधाता का लाख- लाख शुक्र है।
आनंद-- चांदनी।
चांदनी-- (चौंक कर) हाँ?
आनंद-- मैं आऊं ?

1 comments:

पलक said...

अनूप ले रहे हैं मौज : फुरसत में रहते हैं हर रोज : ति‍तलियां उड़ाते हैं http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/06/blog-post.html सर आप भी एक पकड़ लीजिए नीशू तिवारी की विशेष फरमाइश पर।