ऊब और दूब पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read uub aur doob in your own script)

Hindi Roman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam

Sunday, June 6, 2010

एक फैसला

(गतांक से आगे)

चांदनी-- पूछ कर आओगे क्या?
आनंद-- नहीं, तुम अँधेरे में बैठी हो तो मैने सोचा कुछ सोच रही होगी तो डिस्टर्ब हो जाओगी ।
चांदनी-- नहीं डिस्टर्ब नहीं होउंगी । तुम आओ। ना, लाईट मत जलाओ। अँधेरे में ही बैठेंगे।
आनंद-- जो हुक्म। अ ..एलो बैठ गए। अब बोलो ।
चांदनी-- ऊपर, इधर बैठो। हाँ ठीक है,
आनंद-- अरे-अरे! क्या बात है। लगता है आज देवता ज्यादा प्रसन्न हैं।
चांदनी-- कैसे?
आनंद-- बीवी अँधेरे में पास बिठाये, गोद में सर रखे तो जरुर ही देवता प्रसन्न हैं।
चांदनी-- अच्छा बस, शरारत नहीं।
आनंद-- ठीक है, कोई शरारत नहीं। अब बताओ क्या कहना है?
चांदनी-- तुम जानते हो मुझे कुछ कहना है?
आनंद--(हंस कर) इतने दिनों में तुम्हारे अंदाज भी ना समझूँ?
चांदनी-- कभी- कभी तुम मुझे चकित कर देते हो।
आनद-- हाँ बोलो क्या कह रही थी?
चांदनी-- तुम्हारे जाने के बाद बहुत बड़ी- बड़ी बातें हो गयी थीं ।
आनंद-- कहाँ? हास्पिटल में?
चांदनी-- हाँ। विजय ने सोचा ही नहीं था कि मेरी शादी हो गयी होगी।
आनंद--(हंस कर) अच्छा?
चांदनी-- और आज कल्पना से भी बहुत सारी बातें हुईं। मैंने पहली बार जाना कि साथ रहते हुए भी आदमी इतना अकेला हो सकता है। विजय ने उससे प्रेम विवाह किया और फिर उसे एक ऐसे फ्रेम में लगा दिया जिसमें कभी मेरी मेरी तस्वीर थी।
आनंद-- क्या?
चांदनी-- उसने मुझसे स्पष्ट शब्दों में कहा कि विजय ने उसे मेरे विकल्प के रूप में चाहा है। उसकी जिंदगी का सूनापन इतना भयानक था कि उसकी एक लहर ने मुझे अन्दर तक कंपा दिया। कितना कठिन है यह जानते हुए भी कि यह व्यक्ति मुझमे किसी और को तलाश रहा है, फिर भी उसे प्यार करा।
आनंद-- और वह करती है?
चांदनी-- हाँ। वह करती है। मैंने पूछा था। उसने कहा, मैं भले ही इनके लिए आपका विकल्प हूँ, लेकिन ये मेरे लिए किसी का विकल्प नहीं हैं। आनंद, बचपन में मैंने भूतों की कहानियां पढ़ी थी। कोई भूत किसी आदमी में समाँ जाता था और फिर उस आदमी की अपनी जिंदगी ख़त्म हो जाती थी।फिर वह आदमी तमाम उम्र उस भूत की जिंदगी जीता था। कल्पना से मिल कर मैंने अपने आप को एक भूत सा ही महसूस किया।
आनंद-- नहीं चांदनी ऐसे॥
चांदनी-- (बीच में ही) आनंद, मैंने तुमसे एक बात छुपाई है।
आनंद-- क्या?
चांदनी-- जिंदगी के किन्हीं खास क्षणों में बहुत बार मैं तुम्हारी तुलना विजय से कर बैठती थी। आनंद मैं स्वीकार करती हूँ कि कभी- कभी मैं सोचने लगती थी कि कहीं मैंने कोई गलत फैसला तो नहीं कर लिया? नहीं आनंद, हाथ मत रोको। अब कहीं कोई शक नहीं है। आनंद मैंने जाना कि विजय कितना कमजोर इंसान है। सिर्फ अपने-आप में जीने वाला , दुनिया को सिर्फ अपनी नजर से से देखने वाला,हर व्यक्ति पर अपने -आप को आरोपित करने की चाहत रखने वाला एक आत्मकेंद्रित व्यक्ति। बहुत हद तक शायद एक असंतुलित व्यक्ति। जो दूर से एक चट्टान दिखता है पर नजदीक जाओ तो एक घुन लगी लकड़ी !मैंने तुम्हें एक नये सिरे से जाना है आनंद, वो भी अपनी नजर से नहीं,कल्पना की नजर से देख कर। और आनंद, मेरी जिंदगी को तुम्हारी बहुत- बहुत आवश्यकता है।
आनंद-- चांदनी!
चांदनी-- हाँ आनंद!!


(समाप्त)




यह नाटक मैंने सन ८८ में आकाशवाणी पटना के लिए लिखा था जो 'एक मुलाकात के बाद ' नाम से प्रसारित हुआ था। इससे जुड़ा एक वाकया याद आता है- इस नाटक का प्रसारण किसी- ना- किसी कारण से टलता ही जा रहा था। उस समय के ड्रामा डायरेक्टर उपाध्याय जी -मुझे उनका पूरा नाम स्मरण नहीं रहा- ने मुझे कहा "आपके इस 'एक फैसला' का फैसला नहीं हो पा रहा है, आप इसका नाम बदल दीजिये।" तो मैंने इसका नाम बदल दिया और तब सच ही इसका प्रसारण हो गया।

0 comments: