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Sunday, January 5, 2014

वापसी

                   तीन वर्षों के बाद एक बार फिर मैं अपने ब्लॉग पर हूँ। काफी लम्बा अर्सा है यह कुछ बदलने के लिये। लेकिन कुछ बदला नहीं। वही एक जैसे दिन-रात, वही एक जैसे सुख-दुख। उम्र के इस मोड़ पर कुछ बदलने की बात भी व्यर्थ ही है शायद। हाँ, जिन्दगी सिर्फ मृत्यु की प्रतीक्षा में ना बीते, इसके लिये कुछ प्रयत्न अवश्य किये मैंने।
                    अपनी स्मरणशक्ति और व्यस्तताओं से लड़ते हुये मैंने 'इग्नू' (इन्दिरा गांधी ओपेन यूनिवर्सिटी) से हिन्दी में एम. ए. कर लिया। इतने सालों के बाद पढ़ने के लिये पढ़ना और पढ़ कर याद रखना - सचमुच कठिन था। मैंने 55-56 % से ज्यादा की उम्मीद नहीं की थी, लेकिन जब रिजल्ट 62 % का आया तो सचमुच खुशी हुई थी।
                   कुछ कहानियाँ भी प्रकाशित हुईं। जिसमें 'परिकथा'-फरवरी 20011 नवलेखन अंक में छपी कहानी ' अनुत्तरित' ने काफी प्रशंसा पायी। और पिछले साल 'हंस' के अक्टूबर अंक में आयी कहानी 'एक मुलाकात के बाद' तो एक उप्लब्धि की तरह आयी। राजेन्द्र यादव जी से फोन पर - पहली और दुर्भाग्य से आखिरी भी - बात हुई। उन्होंने कहानी के लम्बी होने की बात कही थी। लेकिन जब मैंने कहा कि संक्षिप्त करने से तो बद्सूरत हो जायेगी, तो उन्होंने कहा था-" सो तो है। देखते हैं फिर।" और कहानी छप गयी। पूरी- की-पूरी। बिना किसी काट-छाँट के। मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरी कहानी कभी 'हंस' में छपेगी। और छपेगी भी तो इतनी प्रशंसा पायेगी। लेकिन प्रशंसा मिली और बहुत मिली। 40-50 फोन कॉल्स और स एम स किसी भी लेखक- वो भी नवोदित- के लिये निश्चित रूप से बड़ी बात है।
                  किसी ने पूछा था-' जब तुम घर- गृहस्थी के झंझटों से मुक्त हो जाओगी तब क्या करोगी ?' और मैंने कहा था-' जब तक हाथ चलेगा प्रेसक्रिप्शन लिखूंगी और जब तक दिमाग चलेगा कहानियाँ लिखूंगी।' मुझे लगता है मैंने मृत्यु तक जिन्दा रहने का रास्ता ढूढ लिया है। आज बस इतना ही।    
                          

Saturday, December 11, 2010

अधूरी कविता

सोचा था मैंने
लिखूंगी मैं भी
धधकती किसी घटना पर
सुलगती-सुलगाती
कोई कविता।

सामने था अखबार
सुर्खियों में छपा था
अपने पचहत्तर सैनिकों की
हत्या का समाचार।

भर आईं आंखें
कलम उठाने से पहले
जुड़ गये हाथ
प्रार्थना में
मिले उनकी आत्मा को
शांति
धैर्य मिले उनके परिजनों को।
पर जाने कैसे
बदल गये प्रार्थना के शब्द
शहर से दूर पोस्टेड
पति की मंगलकामना के लिए।

हर बार यही हो जाता है
मिलते हैं ट्रेन में बम
उड़ाई जाती हैं पटरियां
और इसके पहले कि
बिखरी हुई लाशों की पीड़ा
घायलों की चीखें
मथकर कलेजे को
ले सके शब्दों का
आकार,
उड़ जाती है
मेरी आंखों से नींद!
चढ़ चुका होगा मेरा बेटा
ऐसी ही किसी ट्रेन में
घर आने के लिए

कल ही हुआ था
स्कूल जा रहे बच्चे को
खींच ले गये थे
अपहरणकर्ता।
भीग गया मन
सोचकर
कैसे जी रही होगी उसकी मां
क्या-क्या मान रही होगी
मन्नतें,
जाने कहां-कहां टेक रही होगी
अपना माथा

लेकिन इसके पहले कि
डूब पाती मैं
उसकी पीड़ा में
घड़ी की सूइयों ने
बताया
कि देर हो रही है बाबू को
स्कूल से लौटने में।
रखकर हाथ की कलम
धाड़-धाड़ बजते कलेजे के साथ
मैं निकल आई
दरवाजे पर।

हर बार सोचती हूं
इस बार लिखूंगी
कुछ चुभता सा।
लेकिन हर बार रह जाती हूं
अपने ही भय की कीरचों से
बिंध कर।

Sunday, November 7, 2010

जिंदगी का कटोरा

बीत रहे हैं दिन
लिए हुए हाथों में कटोरा
भीख मांगते हुए जिंदगी से,
जिंदगी की!
रोज देखती हूँ कटोरे को
उलट कर , पलट कर,
सीधा कर, झुका कर।
कोई बूँद है क्या इसमें,
किसी रस की?
ना, सूखा है, रीता है,
जाने कब से
ऐसे ही पड़ा है।
साथ ले चलो,
चल पड़ेगा,
रख दो उठा कर कहीं,
पड़ा रहेगा।
फेंक दो,
झंनाता रहेगा थोड़ी देर
फिर स्थिर हो जायेगा।
धूप में तप जाता है
ठंढ में डंक मारता है
जिंदगी का कटोरा
यूं ही साथ चलता रहता है।

Sunday, September 5, 2010

लड़की जो नहीं मिली

कभी हुआ करती थी/ कहीं एक लड़की/
एक छोटे से घर की/ बड़ी सी राजकुमारी/
आँखों में लिए हुए सपने/ सीने में भरे हुए/
उमंग और हौसला/ कर रही थी कोशिश/
अपनी संभावनाओं को/ संभव बनाने की/
कोई शिकायत नहीं थी/ कि/
सर पर कितनी तीखी है घूप/ या/ पैरों के नींचे/
कितने पथरीले हैं रास्ते/
थी सिर्फ एक चाहत/ जिंदगी को जियूं/
अपनी शर्तों पर/अपने मूल्यों पर/
जाने किधर से आया/ समय का पहिया/
हँसता हुआ/ उसके उमंग और हौसलों पर/
ढकता चला गया उसे/ परिस्थियों के गर्दो गुबार में/
गुबार के छटने पर/पीछे जो रह गयी/वह थी/
समय के पहिये के नींचे/ कुचली हुई/
सहमें कन्धों और/ झुके हुए सर वाली/
एक औरत/ देती रही देर तक/ आवाजें/
आ मिल जा री/ ओ लड़की/
तूं तो प्राण थी मेरा/ रह गयी हूँ मैं/
तेरे बिना/ सिर्फ एक शरीर हो कर/
ढूढती रही उसे वो/ पागलों की तरह/
चावल की बोरियों के पीछे/
आटे के कनस्तरों के नीचे/
धोबी की बही में/ राशन की लिस्ट में/
अगरबत्ती के धुएं में/ बिस्तर पर फैले/ पुरुष की बाहों में/
गोद में सोये/ शिशु की आखों में/ नहीं मिली वो/
कहीं नहीं मिली/अब भी प्रतीक्षा/ कर रही है उसकी/
उम्र के किसी मोड़ पर/ कभी तो मिल जाये/ कहीं/
एक बार लिपट कर/ उसके गले से/
रो तो ले/ जी भर के।

Thursday, July 1, 2010

मन का कोना

थोडा और मर गया
मन का वह कोना
जो शेष रहता आया है
अब तक तुम्हारे लिए।
जाने कितने उलाहनों
अनगिनत तानों से
बार-बार छलनी होता हुया,
मरने लगा है
आहिस्ता-आहिस्ता।
मैनें भी छोड़ दिया है डालना,
आशाओं का खाद
आसुंओं का पानी।
मरता है ,
मर जाये।
क्या फर्क पड़ता है!
शारीर को जिन्दा रहना चाहिए,
जिन्दा रहेगा।
यूँही उठता बैठता रहेगा
तुम्हारी भावों के इशारों पर,
निभाता रहेगा
यंत्रवत सारे क्रिया-कलाप।
फिर भी नहीं उतर पायेगा
तुम्हारे एहसानों का कर्ज।
बड़ी इच्छा है,
चिता पर चढ़ने से पहले भी
पूछ सकूँ तुमसे
क्या मेरी जिंदगी भर की
सेवाओं का
कोई मोल है तुम्हारे पास?
क्या जुटा सकुंगी
उस वक्त भी ,
इतना साहस?

Monday, May 17, 2010

तेरा कमरा

थोड़ी देर बैठूं
तेरे सूने कमरे में,
थोड़ा और गहरा कर लूं
तेरे चले जाने का
एहसास !
कि जब तूं होता है
यह कमरा भी
बातें करता है।
तेरी ढेर सारी
ऐली- फैली चीजों को
अपने में समाये
थोड़ा झुंझलाता हुआ
पर खुश दिखता है।
इतराता है
अपने आप पर-
उसे पता है
कि विशिष्ट है वह थोड़ा
घर के शेष हिस्से से,
कि उसमें रहने वाले
चहरे के जगमग से
जगमगा रही हैं
पिता कि आशाएं,
और जिसकी आँखों में
तैरते सपनों में
देखती है माँ
अपने हिस्से का आकाश।
और जहाँ एक बच्चा
दिन भर डोलता है
एक छोटी- सी
जादुई दुनिया की तलाश में।
अब जबकि तूं
नहीं है यहाँ
और 'बाबु' ने
समेट दिया है
इसके बिखरेपन को,
हर कोना सजा दिया है
बड़े यत्न से ,
बड़ी तरतीब से,
कितना अकेला हो गया है
यह कमरा!
चुप है, उदास है, बोझिल है!
नहीं , जरा भी नहीं चौंका है
मेरे आने से।
बस, डूबा है अपने सूनेपन में!
मेरी तरह उसे भी
प्रतीक्षा है
तेरे फिर आने की।

Wednesday, March 31, 2010

जख्म और संवेदना

आदत रही है
खुद पर लगे जख्मों को
जानवरों की तरह
चाट-चूट कर
खुद ही ठीक कर लेने की!
लेकिन इस बार जख्म
पीठ पर है।
ना कोई सहलाता हुआ
स्पर्श है,
ना कोई मरहम।
बार-बार उठ रही है टीस ,
दर्द की लहरें
झकझोर रही हैं
पूरे शरीर को।
क्या करू?
छोड़ दूं खुला?
सड़ जाने दूं?
फ़ैलने दूं जहर
पूरे शरीर में?
या प्रतीक्षा करूँ
खुद ही सूख जाने की
वक्त के साथ
धीरे- धीरे।
बन जाने दूं
घाव को नासूर?
फिर आदत पड़ जाएगी
इस दर्द के साथ
जीने की!
हाँ पता है,
मर जाएगी संवेदना
वहाँ पर की।
ठीक ही तो है,
ऐसे भी जरुरी है
जीने के लिए ,
संवेदनाओं का
मर जाना।

Sunday, March 7, 2010

दीवार पर टंगा कलैंडर

दीवार पर टंगा कलैंडर
बदलती रहा है तारीखें
टंगी रह गयी है
तस्वीर!
भले ही टांगने वाले ने
टांगा था उसे
अपनी दीवार पर
मुग्ध होकर
उसकी सुन्दरता पर,
रीझ कर उसके
ख़ूबसूरत रंगों पर,
घंटों सामने खड़ा
निहारा भी करता था
उसकी नैसर्गिगता को!
पर धीरे-धीरे
तस्वीर कलैंडर हो गयी।
हो गयी धुंधली,
ढक गयी
समय की धूल के नींचे
कोई पोंछ दे हौले से
उस गर्द को,
अपनी उंगलिओं से
चमक उठेगी तस्वीर
मुस्कुराने लगेंगे
उसके रंग।
पर किसे फुरसत है इतनी?
किसे है इतनी परवाह?
अब सिर्फ काम आती है,
तारीखें देखने के,
जाड़ा-गर्मी-बरसात,
टंगी रहती है यूं ही।
कहीं नहीं जाती है,
कभी नहीं जाती है।

Sunday, January 31, 2010

कठपुतली

मेरे मालिक ,
लो मैं फिर प्रस्तुत हूँ
नाचने के लिए
तुम्हारे इशारों पर!
बहुत चाहा था मैंने,
झटक डालूँ
उन धागों को
जो बांधे हैं तुमने
मेरे हाथो से, पैरो से।
रच लूं एक नया आकाश
और खो जाऊं
उसकी निस्सीमता में!
लेकिन मेरे मालिक
मैं कहाँ से लाती
इतनी सामर्थ्य
वर्षो से अपाहिज बने
अपने हाथो में।
देखो, किस तरह लहूलुहान
अपने टूटे पंखो के साथ
पड़ी हूँ
इस पथरीली
रेतीली जमीन पर
भीख मांगती तुम्हारी दया की।
हाँ मेरे मालिक
स्वीकार कर लिया है मैंने
कि तुम नियंता हो मेरे
और मैं
कठपुतली तुम्हारी।

Tuesday, December 8, 2009

मरहम

'देखो ना
फ़िर जल गया हाथ
छू गया गर्म तवे से'
'नाश्ता मिलने में देर है
अभी लगता है'
'लगा रही हूँ,
बस पाँच मिनट और।
देर से लौटोगे
क्या आज?'
'ओह,
मोज़े कहाँ चले गए मेरे!'
'वे रहे,
पड़े हैं जूतों के अन्दर।
थोड़ा लौटते सवेरे
तो निकलते कहीं हम
कितना वक्त हो गया
कहीं निकले हुए।'
'अब कहाँ चली गई
ये फाईल भी?'
'ये रही,
पड़ी थी टेबल पर।
आ सकोगे
थोड़ा पहले क्या?
'लगा लो दरवाजा।
हाँ, मत इंतजार करना
दुपहर के खाने पर मेरा,
मैं खा लूँगा कुछ
उधर ही।'
'अच्छा, लेकिन हो सके तो
कर देना एक फोन।'
'ठीक, बंद कर लो।'
चलूँ, समेटूं घर के
काम को।
अरे, पहले लगा लूँ
इस जले पर
कोई मरहम।

Wednesday, August 19, 2009

एक शाम

मुझे याद है वो शाम,
जब शाम का धुंधलका
खिड़की के बाहर
धीरे धीरे फ़ैल रहा था और
आकाश से कुहासे बरस रहे थे।
तुम बिस्तर पर लेटे थे
और मैं तुम्हारे पैरों के पास बैठी थी।
जाने कब बाहर फ़ैल रहा धुंधलका
तुम्हारे चहरे पर उतर आया,
और कमरे के गहराते अंधेरे में मैंने
तुम्हारी लम्बी पलकों पर
कुहासे की बुँदे देखी।
अनायास ही मेरे हाथ उठे ,
मैं पोंछ दूँ तुम्हारी पलकें।
लेकिन, तुम्हारा चेहरा मुझसे दूर था
और मेरी बाहें छोटी।
तुमने सर नहीं झुकाया,
और मैं?
मैं तो तुम्हारे पैरों के पास बैठी थी।
--तब की, जब मैं अठारह साल की थी।

Tuesday, July 28, 2009

इंशा अल्लाह मेरे बेटे

उसने बताया मुझे
क्लास की
सबसे सुंदर लड़की ने
किया है उसे 'प्रपोज'!
मैंने हंस कर कहा ,
स्वागत है उसका
हमारे परिवार में।
वह बोला ,
मुझे नहीं चाहिए
दीवार पर टांगने के लिए
कलैंडर ,
मुझे चाहिए
कंप्यूटर,
जिस पर बना सकूँ मैं
रोज नए प्रोग्राम।
मैंने हंस कर कहा,
क्या करेगा
दिमाग वाली लड़की ?
गृहस्थी के लिए
ठीक रहती हैं
कम दिमाग वाली
सुन्दर लड़कियां।
वह बोला
नहीं चाहिए मुझे
हर बात पर
'जैसी आपकी इच्छा ',
कहने वाली।
मुझे चाहिए वो
जो दे सके मुझे
सही और ग़लत का
निर्णय कर के।
मैंने पूछा
नौकरी करेगी वो?
हाँ माँ,
उसके होंगे ढेर सारे अधीनस्थ?
हाँ माँ,
उसका दिमाग होगा बाहर
लेकिन दिल होगा
घर में ?
हाँ माँ ,
बाँध कर रखेगी
पूरे परिवार को
अपनी बाहों में?
हाँ माँ ,
उसका चेहरा चमकेगा
स्वाभिमान की चमक से?
हां माँ,
वह 'ना' कह सकेगी तुझे
तेरी किसी बात के लिए?
हां माँ।
मैंने खुश हो कर कहा ,
फ़िर मैं बनाउंगी
उसके लिए भी खाना
उसकी पसंद का।
वह हंस कर बोला
'कुक ' रख लेंगे माँ।
इंशा अल्लाह मेरे बेटे!

Tuesday, July 7, 2009

कैसी हो तुम अब

उसे करनी होती हैं
बहुत सारी बातें
वह जब भी फोन करता है मुझे।
क्लास में मिले
किसी अच्छे कमेन्ट की,
ईर्ष्या से भरे
दोस्तों की प्रशंसाओं की,
कंधे पर टिके सर के
रेशमी बालों से
उठती खुशबुओं की,
अपनी महत्वाकांक्षाओं की,
बनते बिगड़ते योजनाओं की।
मैं चुप हो कर सुनती हूँ
आकाश में उड़ने को आतुर
उसके पंखों की आहटें ,
आशीषें देती हुई
हंसती रहती हूँ ,
उसकी बातों पर।
लेकिन शायद वह सुन लेता है
हँसी में दबी
मेरे अकेले पन की गूंज को,
आहिस्ता से उतर आता है
धरती पर ,
और पूछता है मुझसे ,
कैसी हो तुम अब?

Sunday, June 14, 2009

देह राग से परे

छुट्टी का एक दिन
मेरे साथ भी बिताओ जी!
नहीं, ऐसे नहीं।
देह राग से परे
सुनते हैं आज
कोई नया राग।
अच्छा, नहीं आता
तुम्हारी समझ में
ऐसा कुछ?
ठीक, चलो देख आते हैं
शहर की रौनक।
तुम्हे पसंद नहीं भीड़- भाड़?
मुझे भी कहाँ पसंद है।
चलो ,चलते हैं
किसी सूनी सड़क पर
जहाँ बिछे होंगे
पलाश के फूलों के लाल गलीचे।
मत करना दफ्तर की बातें
बच्चों के भविष्य की बातें भी नहीं
कुछ कहना तुम
अपने मन की,
कुछ कह लूंगी
मैं अपने दिल की।
अच्छा, नहीं बची है अब
तुम्हारे पास कोई बात
और सुन चुके हो मेरी भी बहुत!
चलो ठीक है,
कुछ नहीं बोलेंगे हम,
बस, चलते रहंगे
एक दूसरे का हाथ पकडे
और सुनेंगे,
गिरते पत्तों की ताल पर
बहती हवाओं का संगीत!
क्या कहा तुमने?
जब चुप ही रहना है
तो क्या बुरा है घर?
ठीक है फ़िर
तुम खोल लो टी वी
और मैं खोल लेती हूँ
फ़िर से आज का अखबार।
दिन ही तो काटने हैं,
कट जायेंगे!

Sunday, May 10, 2009

आईने से बाहर

किसी दिन
आईने से बाहर निकल
मेरे चेहरे,
घूम आ कहीं
सडकों, गलियों, चौराहों पर।
फैला कर अपने नथुनों को
भर ले ढेर सारी ताजा हवा,
अपने फेफडों में,
और सोंच ले
कि अब चुप नहीं रह जाएगा
हर बात पर
लम्बी साँसें खींच कर।
नोच कर फेंक दे
अपने होठों पर
ताले कि तरह जड़ी
इस मुस्कान को
और वो बोल
जो रुका है अर्से से
तेरी जुबान पर।
यह दिखा,
देखने वालों को
कि समझौतों के नाम पर
और पलकें नहीं झुकायेगा तूं ,
कि खीचने आते हैं
तुझे भी
भौहों के धनुष।
और मेरे चेहरे
यह तय कर ले
कि अब तेरा सर
टिका रहेगा
तेरे ख़ुद के कन्धों पर,
कि अब जीने के लिए
किसी और के कन्धों की भीख
नहीं मांगेगा तूं।
किसी दिन आईने से बाहर
निकल मेरे चेहरे,
किसी दिन बाहर निकल।

Monday, May 4, 2009

हैपी बर्थ डे भाई

आज 6 मई है। अनुराग का जन्मदिन। जबसे वह मुझे दुबारा मिला है, मैं उसे हर बार विश करती हूं; इस विश्वास के साथ कि उसे इसकी प्रतीक्षा होगी।

उसके दुबारा मिलने से मेरा तात्पर्य तब से है, जब मैंने उसे लंबे अंतराल के बाद तब देखा जब वह 19-20 वर्ष का हो चुका था। उसके पहले वह 4 वर्ष का था, जब हमलोग रांची से पटना आ गये थे। और पटना से रांची और रांची से पटना की दूरी वर्षों में फैल गयी थी।

इन वर्षों में बहुत कुछ घटित हुआ था उसमें एक घटना मेरी शादी भी थी। मैं ससुराल में थी जब अनुराग मेरी मां के यहां आया था। मेरी उससे मुलाकात नहीं हो पायी थी। कुछ दिनों बाद, अपने पहले बच्चे के जन्म के बाद मैं मायके आई हुई थी और मैं किसी कारण दरवाजे पर खड़ी हुई थी जब मैंने एक सांवले लड़के को रिक्शे पर आते देखा। उसने रिक्शे से उतरते हुए मुझे बड़ी आत्मीयता से देखा तो मुझे आश्चर्य हुआ और जब रिक्शेवाले को पैसे देते हुए उसने मुझे फिर देखा तो मुझे उसके नदीदेपन पर गुस्सा भी आया। फिर मैं उसे आश्चर्य से देखती रही जब वह मेरे पास आया और सूटकेस नीचे रखकर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। तु हमरा न पहचानबे - उसने कहा। हम तोरा सच में न पहचानलियउ - मैंने विस्मय से उबरते हुए कहा। हम अनुराग हियउ - उसने कहा और मेरे पैरों में झुक गया। उस वक्त 'खुश रह' के अस्फुट उच्चारण के साथ उसकी पीठ पर हाथ रखते हुए मेरी आंखें भीग गई थीं। क्यों? पता नहीं। आत्मीयता शायद इसी तरह अंतःकरण पर दस्तक देती है। उस रोज खुले दरवाजे से अंदर आया अनुराग, सीधे उस घर में रहनेवालों के दिलों में उतरा। भइया के गिटार पर अपनी धुनें बजाते हुए उसने स्वयं को भाभी का दूसरा वर धोषित किया और मेरी मां को बड़ी मां पुकारता हुआ पूरे घर में फैल गया। 4 वर्ष का अनुराग मेरी मां के साथ ही सोता था। लेकिन 20 वर्ष के अनुराग ने अपनी चाची को बड़ी मां बनाया और जैसे आंधी में उखड़ गये पेड़ को अच्छे से धरती में लगा दिया। वह मेरा भाई था, लेकिन मित्र बन गया। हम सबकुछ बांटने लगे। सुख-दुख, अपक्षाएं-उपेक्षाए, टूटना-जुड़ना - सब कुछ।

मुझे याद है मेरे दूसरे बच्चे के जन्म के समय मुझे खून चढ़ाने की नौबत आ गई थी। मैंने उसे इस आशंका के विषय में पहले बताया तो उसने ऑपरेशन के समय मौजूद रहने की बात कही ताकि जरूरत पड़ने पर वह अपना खून दे सके (उसके मेरे खून का ग्रुप एक ही है)। लेकिन किसी कारण से वह बच्चे के जन्मोत्सव में भी नहीं आ पाया था। बाद में मिलने पर मैंने उसे उलाहना दिया था - तु हमारा खून देवे ला आवे वाला हलें, तु तो बाबू के छट्ठियो में भी न अइलें। वह आंखों में आंसू भर कर मुझे देखता रहा, फिर मेरे पास पूछने के लिए कुछ नहीं बचा था।

वह मुझसे कभी हिंदी में बात नहीं करता। शायद दुनियादारी की यह भाषा हमारी आत्मीयता को सही रूप में विश्लेषित नहीं कर पाती। ढेरों स्मृतियां हैं। पत्रों की, बातों की, फोन कॉल्स की, जो मुझे उसके व्यक्तित्व की विविधता का स्मरण करा रही हैं। लेकिन वह सब फिर कभी। आज उसका जन्मदिन है और ईश्वर से मेरी प्रार्थना है कि उसे वह सब कुछ मिले जो उसकी चाहना है। खूब फले-फूले - यह सच भी हो। अपने क्षेत्र मे ध्रुव तारे की तरह चमकता रहे।

हैपी बर्थ डे भाई।

पुनश्च -
कुछ दिन पहले पाउलो पोलहो का उपन्यास ब्रिडा पढ़ी थी, उसमें सोल मेट की बात कही गई है। लेकिन उसकी अवधारणा है कि सोल मेट प्रेमी प्रेमिका ही होते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि सोल मेट कोई भी हो सकता है - बेटे-बेटी, मां-बाप, भाई-बहन, कोई भी। है न!

Sunday, April 26, 2009

लौट आई हूँ मैं

बादलों पर चलने और
चाँदनी में नहाने दिन
नहीं रहे अब मेरे।
क्योंकि चाँद की दुनिया से
लौट आई हूँ मैं।
बालों को उलझाती
पागल हवाओं नें
साथ उड़ चलने का निमंत्रण
वापस ले लिया है।
बारिश का पानी भी अब
कतरा कर निकालने लगा है मुझसे
क्योंकि उसे भी पता है
कि इसके पहले कि उसकी छुअन
मेरे प्राणों तक पहुंचे
मैं झटक दूंगी उसकी बूंदों को।
ये चाँदनी, ये हवाएं, ये बारिश,
हैरत में हैं
ये देख कर
कि मैंने तलाश शुरू कर दी है
अपने पैरों के नींचे की जमीन की
और लौट आई हूँ
चाँद की दुनिया से।

Friday, April 17, 2009

बात जो अटक गई

पिछले मार्च महीने में २५ तारीख के 'इंडिया टुडे ' का एक अंक आया 'इंडिया टुडे कान्क्लेभ'। मुख्यत: आंतंकवाद पर केंद्रित इस अंक में 'दलाई लामा' से लेकर पकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति 'परवेज मुशर्रफ ' से ले कर 'शाहरुख़ खान' तक के विचार छपे हैं। इन सभी भाषणों में जिन दो भाषणों ने मुझे सर्वाधिक आकृष्ट किया,वे हैं 'दलाई लामा' और 'मौलाना महमूद मदनी' के।
मैं कोई विचारक या आलोचक नहीं हूँ। बस एक सामान्य मनुष्य की तरह अच्छे और बुरे को देखती हूँ। इसलिए बस इतना ही कह सकती हूँ कि 'दलाई लामा' को पढ़ना सुख और शान्ति के बीच से गुजरने जैसा था। उनके भाषण के अन्तिम अंश के वाक्यों में एक वाक्य -"आप धार्मिक सहिष्णुता और अहिंसा के अपने धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को अपनाएं"-मेरे विचार से अभी की परस्थिति की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
'मौलाना महमूद मदनी' साहब का भाषण बहुत प्रभावित करता है। यह दिमाग की धुंध साफ़ करने जैसा है। लेकिन उनके भाषण में जो बात मुझे अटक गई वो थी -"मुझसे पूछा जाता है कि मैं इस्लाम से मुहब्बत करता हूँ या इस मुल्क से ? यह एक कठिन सवाल है। अगर मैं कहता हूँ इस्लाम से तो वे मुझे राष्ट्रभक्त नहीं मानेंगे। मुझे हमेशा ही इस्लाम या भारत के प्रति अपनी वफादारी साबित कराने के लिए कहा जाता है। अब मैं कहता हूँ कि मेरी दो आँखे हैं और आप हमें बताएं कि किसे रखूं और किसे फेंक दूँ। लेकिन मैं अपने महजब को प्राथमिकता दूंगा जिसने मेरे अन्दर अपने मादरे वतन की रक्षा के लिए जिंदगी कुर्बान करने का जज्बा दिया ......."।
मैं 'मौलाना मदनी' साहब के विचारों का अत्यन्त आदर करते हुए अपनी तरफ़ से एक बात कहना चाहती हूँ-अगर कोई मुझे दो विकल्प दे, तुम हिंदू रहो लेकिन तुम्हें भारत छोड़ कर किसी और देश में में बस जाना होगा, या , तुम्हें भारत में रहने के लिए कोई दूसरा धर्म स्वीकार करना होगा, तो मैं निश्चित रूप से दूसरा विकल्प स्वीकार कर लुंगी। क्योकि मेरे लिए मेरा देश नि:संदेह मेरे धर्म से बड़ा है। इस विषय में मेरे इक ही आँख है ,वो है 'हिंदुस्तान'।

Tuesday, April 7, 2009

एक काली लकीर

सोंधा-सोंधा महकता है बाबु
जब लौटता है खेलकर
धूल मिटटी और
पसीने में नहाकर।
डाल कर अपनी बाहें
मेरे गले में
झूल जाता है
आम के पेड़ में झूलते
टिकोले की तरह।
रगड़ता है अपने गाल
मेरी बांह से,
दिखाता है अपने छिले हुए घुटने।
दर्द कम हो कुछ उसका,
मैं चूम लेती हूँ उसका मुंह
और ठिठक जाती हूँ।
बस, कुछ दिन और,
फ़िर रुई की तरह नर्म
इस होंठ पे ,
उभर आएगी
एक काली लकीर,
जो धीरे-धीरे फैलती चली जायेगी
मेरे और उसके बीच में।

Wednesday, April 1, 2009

कुछ क्षणिकाएं

(१)

लगा था कि
अंजलि भर गई,
कब तक ठहरता ?
पानी ही तो था,
बह गया।

(२)

मेरा हाथ माँगते हुए
तुमने कहा था,
बदल दूंगा इनकी लकीरें।
तुम्हारे हाथ में
अपनी हथेलियाँ
सौंपने के बाद लगा
तुममें रेखाओं को
बदलने की
इच्छा तो थी
चेष्टा नहीं

(३)

अब पीठ को घेरती
बांह नहीं होती
जिंदगी धरातल पर
उतर आई है,
बिन बोले ही
तय होने लगे हैं रास्ते ,
गृहस्ती चल निकली है।

(४)

जाने क्यों
अपना चेहरा
बदरंग नजर आने लगा है,
तुम्हारी आखों के दर्पण
धुंधलाने लगे हैं शायद।

----कुछ पुरानी रचनाएँ