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Saturday, December 11, 2010

अधूरी कविता

सोचा था मैंने
लिखूंगी मैं भी
धधकती किसी घटना पर
सुलगती-सुलगाती
कोई कविता।

सामने था अखबार
सुर्खियों में छपा था
अपने पचहत्तर सैनिकों की
हत्या का समाचार।

भर आईं आंखें
कलम उठाने से पहले
जुड़ गये हाथ
प्रार्थना में
मिले उनकी आत्मा को
शांति
धैर्य मिले उनके परिजनों को।
पर जाने कैसे
बदल गये प्रार्थना के शब्द
शहर से दूर पोस्टेड
पति की मंगलकामना के लिए।

हर बार यही हो जाता है
मिलते हैं ट्रेन में बम
उड़ाई जाती हैं पटरियां
और इसके पहले कि
बिखरी हुई लाशों की पीड़ा
घायलों की चीखें
मथकर कलेजे को
ले सके शब्दों का
आकार,
उड़ जाती है
मेरी आंखों से नींद!
चढ़ चुका होगा मेरा बेटा
ऐसी ही किसी ट्रेन में
घर आने के लिए

कल ही हुआ था
स्कूल जा रहे बच्चे को
खींच ले गये थे
अपहरणकर्ता।
भीग गया मन
सोचकर
कैसे जी रही होगी उसकी मां
क्या-क्या मान रही होगी
मन्नतें,
जाने कहां-कहां टेक रही होगी
अपना माथा

लेकिन इसके पहले कि
डूब पाती मैं
उसकी पीड़ा में
घड़ी की सूइयों ने
बताया
कि देर हो रही है बाबू को
स्कूल से लौटने में।
रखकर हाथ की कलम
धाड़-धाड़ बजते कलेजे के साथ
मैं निकल आई
दरवाजे पर।

हर बार सोचती हूं
इस बार लिखूंगी
कुछ चुभता सा।
लेकिन हर बार रह जाती हूं
अपने ही भय की कीरचों से
बिंध कर।

Sunday, November 7, 2010

जिंदगी का कटोरा

बीत रहे हैं दिन
लिए हुए हाथों में कटोरा
भीख मांगते हुए जिंदगी से,
जिंदगी की!
रोज देखती हूँ कटोरे को
उलट कर , पलट कर,
सीधा कर, झुका कर।
कोई बूँद है क्या इसमें,
किसी रस की?
ना, सूखा है, रीता है,
जाने कब से
ऐसे ही पड़ा है।
साथ ले चलो,
चल पड़ेगा,
रख दो उठा कर कहीं,
पड़ा रहेगा।
फेंक दो,
झंनाता रहेगा थोड़ी देर
फिर स्थिर हो जायेगा।
धूप में तप जाता है
ठंढ में डंक मारता है
जिंदगी का कटोरा
यूं ही साथ चलता रहता है।

Sunday, September 5, 2010

लड़की जो नहीं मिली

कभी हुआ करती थी/ कहीं एक लड़की/
एक छोटे से घर की/ बड़ी सी राजकुमारी/
आँखों में लिए हुए सपने/ सीने में भरे हुए/
उमंग और हौसला/ कर रही थी कोशिश/
अपनी संभावनाओं को/ संभव बनाने की/
कोई शिकायत नहीं थी/ कि/
सर पर कितनी तीखी है घूप/ या/ पैरों के नींचे/
कितने पथरीले हैं रास्ते/
थी सिर्फ एक चाहत/ जिंदगी को जियूं/
अपनी शर्तों पर/अपने मूल्यों पर/
जाने किधर से आया/ समय का पहिया/
हँसता हुआ/ उसके उमंग और हौसलों पर/
ढकता चला गया उसे/ परिस्थियों के गर्दो गुबार में/
गुबार के छटने पर/पीछे जो रह गयी/वह थी/
समय के पहिये के नींचे/ कुचली हुई/
सहमें कन्धों और/ झुके हुए सर वाली/
एक औरत/ देती रही देर तक/ आवाजें/
आ मिल जा री/ ओ लड़की/
तूं तो प्राण थी मेरा/ रह गयी हूँ मैं/
तेरे बिना/ सिर्फ एक शरीर हो कर/
ढूढती रही उसे वो/ पागलों की तरह/
चावल की बोरियों के पीछे/
आटे के कनस्तरों के नीचे/
धोबी की बही में/ राशन की लिस्ट में/
अगरबत्ती के धुएं में/ बिस्तर पर फैले/ पुरुष की बाहों में/
गोद में सोये/ शिशु की आखों में/ नहीं मिली वो/
कहीं नहीं मिली/अब भी प्रतीक्षा/ कर रही है उसकी/
उम्र के किसी मोड़ पर/ कभी तो मिल जाये/ कहीं/
एक बार लिपट कर/ उसके गले से/
रो तो ले/ जी भर के।

Thursday, July 1, 2010

मन का कोना

थोडा और मर गया
मन का वह कोना
जो शेष रहता आया है
अब तक तुम्हारे लिए।
जाने कितने उलाहनों
अनगिनत तानों से
बार-बार छलनी होता हुया,
मरने लगा है
आहिस्ता-आहिस्ता।
मैनें भी छोड़ दिया है डालना,
आशाओं का खाद
आसुंओं का पानी।
मरता है ,
मर जाये।
क्या फर्क पड़ता है!
शारीर को जिन्दा रहना चाहिए,
जिन्दा रहेगा।
यूँही उठता बैठता रहेगा
तुम्हारी भावों के इशारों पर,
निभाता रहेगा
यंत्रवत सारे क्रिया-कलाप।
फिर भी नहीं उतर पायेगा
तुम्हारे एहसानों का कर्ज।
बड़ी इच्छा है,
चिता पर चढ़ने से पहले भी
पूछ सकूँ तुमसे
क्या मेरी जिंदगी भर की
सेवाओं का
कोई मोल है तुम्हारे पास?
क्या जुटा सकुंगी
उस वक्त भी ,
इतना साहस?

Sunday, June 6, 2010

एक फैसला

(गतांक से आगे)

चांदनी-- पूछ कर आओगे क्या?
आनंद-- नहीं, तुम अँधेरे में बैठी हो तो मैने सोचा कुछ सोच रही होगी तो डिस्टर्ब हो जाओगी ।
चांदनी-- नहीं डिस्टर्ब नहीं होउंगी । तुम आओ। ना, लाईट मत जलाओ। अँधेरे में ही बैठेंगे।
आनंद-- जो हुक्म। अ ..एलो बैठ गए। अब बोलो ।
चांदनी-- ऊपर, इधर बैठो। हाँ ठीक है,
आनंद-- अरे-अरे! क्या बात है। लगता है आज देवता ज्यादा प्रसन्न हैं।
चांदनी-- कैसे?
आनंद-- बीवी अँधेरे में पास बिठाये, गोद में सर रखे तो जरुर ही देवता प्रसन्न हैं।
चांदनी-- अच्छा बस, शरारत नहीं।
आनंद-- ठीक है, कोई शरारत नहीं। अब बताओ क्या कहना है?
चांदनी-- तुम जानते हो मुझे कुछ कहना है?
आनंद--(हंस कर) इतने दिनों में तुम्हारे अंदाज भी ना समझूँ?
चांदनी-- कभी- कभी तुम मुझे चकित कर देते हो।
आनद-- हाँ बोलो क्या कह रही थी?
चांदनी-- तुम्हारे जाने के बाद बहुत बड़ी- बड़ी बातें हो गयी थीं ।
आनंद-- कहाँ? हास्पिटल में?
चांदनी-- हाँ। विजय ने सोचा ही नहीं था कि मेरी शादी हो गयी होगी।
आनंद--(हंस कर) अच्छा?
चांदनी-- और आज कल्पना से भी बहुत सारी बातें हुईं। मैंने पहली बार जाना कि साथ रहते हुए भी आदमी इतना अकेला हो सकता है। विजय ने उससे प्रेम विवाह किया और फिर उसे एक ऐसे फ्रेम में लगा दिया जिसमें कभी मेरी मेरी तस्वीर थी।
आनंद-- क्या?
चांदनी-- उसने मुझसे स्पष्ट शब्दों में कहा कि विजय ने उसे मेरे विकल्प के रूप में चाहा है। उसकी जिंदगी का सूनापन इतना भयानक था कि उसकी एक लहर ने मुझे अन्दर तक कंपा दिया। कितना कठिन है यह जानते हुए भी कि यह व्यक्ति मुझमे किसी और को तलाश रहा है, फिर भी उसे प्यार करा।
आनंद-- और वह करती है?
चांदनी-- हाँ। वह करती है। मैंने पूछा था। उसने कहा, मैं भले ही इनके लिए आपका विकल्प हूँ, लेकिन ये मेरे लिए किसी का विकल्प नहीं हैं। आनंद, बचपन में मैंने भूतों की कहानियां पढ़ी थी। कोई भूत किसी आदमी में समाँ जाता था और फिर उस आदमी की अपनी जिंदगी ख़त्म हो जाती थी।फिर वह आदमी तमाम उम्र उस भूत की जिंदगी जीता था। कल्पना से मिल कर मैंने अपने आप को एक भूत सा ही महसूस किया।
आनंद-- नहीं चांदनी ऐसे॥
चांदनी-- (बीच में ही) आनंद, मैंने तुमसे एक बात छुपाई है।
आनंद-- क्या?
चांदनी-- जिंदगी के किन्हीं खास क्षणों में बहुत बार मैं तुम्हारी तुलना विजय से कर बैठती थी। आनंद मैं स्वीकार करती हूँ कि कभी- कभी मैं सोचने लगती थी कि कहीं मैंने कोई गलत फैसला तो नहीं कर लिया? नहीं आनंद, हाथ मत रोको। अब कहीं कोई शक नहीं है। आनंद मैंने जाना कि विजय कितना कमजोर इंसान है। सिर्फ अपने-आप में जीने वाला , दुनिया को सिर्फ अपनी नजर से से देखने वाला,हर व्यक्ति पर अपने -आप को आरोपित करने की चाहत रखने वाला एक आत्मकेंद्रित व्यक्ति। बहुत हद तक शायद एक असंतुलित व्यक्ति। जो दूर से एक चट्टान दिखता है पर नजदीक जाओ तो एक घुन लगी लकड़ी !मैंने तुम्हें एक नये सिरे से जाना है आनंद, वो भी अपनी नजर से नहीं,कल्पना की नजर से देख कर। और आनंद, मेरी जिंदगी को तुम्हारी बहुत- बहुत आवश्यकता है।
आनंद-- चांदनी!
चांदनी-- हाँ आनंद!!


(समाप्त)




यह नाटक मैंने सन ८८ में आकाशवाणी पटना के लिए लिखा था जो 'एक मुलाकात के बाद ' नाम से प्रसारित हुआ था। इससे जुड़ा एक वाकया याद आता है- इस नाटक का प्रसारण किसी- ना- किसी कारण से टलता ही जा रहा था। उस समय के ड्रामा डायरेक्टर उपाध्याय जी -मुझे उनका पूरा नाम स्मरण नहीं रहा- ने मुझे कहा "आपके इस 'एक फैसला' का फैसला नहीं हो पा रहा है, आप इसका नाम बदल दीजिये।" तो मैंने इसका नाम बदल दिया और तब सच ही इसका प्रसारण हो गया।

Wednesday, June 2, 2010

(गतांक से आगे)

विजय-- तुमने बताया नहीं था।
चांदनी-- तुमने पूछा नहीं था।
विजय-- मैंने सोचा नहीं था।
चांदनी-- आश्चर्य है तुमने कैसे नहीं सोचा था।
विजय-- क्या देखा तुमने इस आदमी में?
चांदनी-- जिन्दादिली, जिंदगी को जी लेने कि चाहत।
विजय-- जिंदगी को जीने का यही तरीका पसंद आया तुमको?
चांदनी-- बड़ा सहज है। विदाउट एनी कप्लिकेशन ।
विजय-- तुम अपने आप को धोखा दे रही हो। समझ नहीं पा रही हो अपने आप को।
चांदनी-- कभी अपने विषय में सोचा है? अरे कल्पना, आप कहाँ जा रही है? विजय?
विजय-- जाने दो उसे। वह सब जानती है।
चांदनी-- (तीखे स्वर में) क्या यह भी जानती है कि तुम अपनी पूर्व प्रेमिका के साथ उसके पति को सहन नहीं कर पा रहे हो? जबकि तुम खुद विवाहित हो?
विजय-- तुम गलत समझ रही हो। मैं सिर्फ...
चांदनी--(बीच में ही ) तुम अपने आप को गलत समझ रहे हो। तुम यह सोचे बैठे थे कि चांदनी तुमसे अलग हो कर अकेली होगी। तुम्हारे यादों के सहारे जिंदगी गुजार रही होगी। है ना? तुम्हें यह देख कर चोट पहुंची है कि मेरी तुमसे अलग एक स्वतंत्र जिंदगी है।
विजय-- मुझसे अलग तुम्हारी कोई स्वतंत्र जिंदगी नहीं है। विवाह कर लेने से क्या होगा, तुम आज भी मुझसे प्यार करती हो।
चांदनी --यह तुमने कैसे सोच लिया?
विजय-- क्योकि तुम आज भी मेरा उतना ही ख्याल रखती हो। मेरे लिए तुम्हारे पास आज भी उतनी ही तत्परता है।
चांदनी-- यह मेरी सदभावना भी हो सकती है। पुरानी पहचान का ख्याल भी हो सकता है। नहीं विजय, मैं तुमसे प्यार नहीं करती। अगर प्यार करती तो अपने पति को तुमसे मिलाने नहीं लती। (मैं सोचती थी कि इतने दिनों में तुम बदल गए होगे, लेकिन नहीं, तुम आज भी वहीँ हो जहाँ मैं तुम्हें छोड़ गयी थी। तब तुम मेरे साथ एक मित्र को देख कर पेशेंस लूज कर गए थे, आज मेरे साथ मेरे पति को बर्दास्त नहीं कर पा रहे हो।
विजय-- देखो चांदनी॥
चांदनी-- नहीं, तुम्हारा ज्यादा टेंशन में आना उचित नहीं है। तुम आराम करो , मैं देखती हूँ कल्पना कहाँ हैं।

(थोड़े विराम के बाद)
चांदनी-- कल्पना, आप यहाँ खडी हैं?
कल्पना-- हाँ, मैंने सोचा मेरी उपस्थिति से आपलोग डिस्टर्ब होंगे।
चांदनी-- शायद हमदोनो के कारण आप डिस्टर्ब हो गयी हैं
कल्पना-- मेरे डिस्टर्ब होने का तो प्रश्न ही नहीं होता है, क्योकि जिस घर में मैं रहती हूँ, उस घर की बुनियाद आप ही हैं।
चांदनी-- और अब शायद उस घर में आप अकेली रहती हैं।(कल्पना की लंबी साँस) विश्वास कीजिये मैं आपके अकेलेपन को बढ़ाने नहीं आई हूँ। सामर्थ्य होती तो कम करने की चेष्टा जरूर करती।
कल्पना--( विषाद युक्त हंसी के साथ) मेरे खुद की चेष्टाएँ तो मेरे अकेलेपन को कम नहीं कर सकीं, शायद आपकी कर पाती।
चांदनी-- एक व्यक्तिगत प्रश्न पूछूं?
कल्पना-- पूछिए।
चांदनी-- आपकी लव मैरिज है या अरेंज?
कल्पना-- लव।
चांदनी-- फिर यह अकेलापन क्योंकर आया कल्पना ?
कल्पना-- मैं विजय के जीवन में आपका विकल्प बन कर आई हूँ चांदनी। अब भी आपको मेरे अकेलेपन के लिए पूछना है?
चांदनी--(स्तब्ध स्वर में) नहीं। लेकिन आपने यह रिश्ता स्वीकार क्यों किया?
कल्पना-- तब नहीं जानती थी कि किस रिश्ते को जीने जा रही हूँ। विजय की विद्वता , उनका गंभीर व्यक्तित्व , किसी को समझने की , उसकी फीलिंग्स को महसूस करने की उनकी क्षमता, और इन सब के ऊपर 'मैं तुम्हें प्यार करता हूँ' इस वाक्य क विशाल और गहरा जाल। फिर कहाँ अवकाश था आगे की जिंदगी को सोचने की व्यवहारिकता बरत सकने का। (लम्बी साँस) वो तो जब जिंदगी के सारे रास्ते बंद कर इनके साथ चली आई, तो जाना , मैंने सिर्फ एक खाली जगह भरी है, अपनी जगह बनाई नहीं है।
चांदनी-- विजय ने बताया नहीं था?
कल्पना-- बताया था। लेकिन यह नहीं बताया था कि वो कल्पना में चांदनी को ढूंढ रहे हैं। आप सोचती हैं , यह हमारी पहली मुलाकात है। आप जरूर मुझसे पहली बार मिल रही हैं, लेकिन मैंने तो आपको बहुत बार देखा है। विजय की आखों में, उनकी कविताओं में, और बहुत बार विजय के पहलू में खुद को ही चांदनी के रूप में देखा है।
चांदनी-- कल्पना बस, बस अब और नहीं।
कल्पना-- (दुःख की हल्की हंसी ) जो आप सुन नहीं सकतीं , उसे मैं जिया करती हूँ। जानती हैं यह एक्सीडेंट कैसे हुआ था? हमलोग एक लॉन्ग ड्राइव पर निकले थे। रास्ते में इन्होंने कहा' चांदनी को बड़ा शौक था इस तरह के लॉन्ग ड्राइव पर जाने का लेकिन मैं हमेशा ही टालता रहा। शायद धैर्य की सीमा कहीं से दरक गयी थी, मेरे मुंह से निकल गया, मैं उतर जाऊं गाड़ी से? मेरी उपस्थिति में चांदनी के ख्याल के साथ ड्राइव करने में असुविधा होगी। बस, इतना ही पर्याप्त था। पत्नी को पास बिठा कर प्रेमिका की बात करना गुनाह नहीं था, लेकिन मेरा यह विरोध जरूर गुनाह था। तुम मिन माइंडेड हो, जो व्यक्ति है ही नहीं, उससे ईर्ष्या करती हो, तुम क्या सोचती हो तुम चली जाओगी तो मैं नहीं जी सकूँगा? मैं पर्याप्त हूँ अपने लिए। मुझे किसी सहारे की जरुरत नहीं। और ना जाना क्या- क्या। और प्रत्येक वाक्य के साथ गाड़ी की बढ़ती स्पीड। कब तक संभलती !
चांदनी-- एक बात कहूं? कहनी नहीं चाहिए फिर भी।
कल्पना-- क्या?
चांदनी-- इतना सब कुछ झेलने की विवशता क्या है?
कल्पना-- मैंने इंटर - कास्ट मैरेज की है चांदनी। कहाँ जाऊँगी मैं? फिर इन सब के बावजूद मैं इन्हें प्यार करती हूँ। इन्होंने भले ही मुझे आपका विकल्प बनाया लेकिन ये तो मेरे लिए किसी का विकल्प नहीं हैं।
चांदनी--(लंबी सांस) शायद अब आपको किसी का विकल्प बनने की जरूरत नहीं पड़े।
कल्पना-- आप मेरी वकालत करेंगी?
चांदनी-- नहीं। मैं आपकी वकालत कर के आप को हल्का नहीं करुँगी। हाँ, मेरी स्थिति शायद आपकी वकालत कर दे।
कल्पना-- मतलब?
चांदनी-- आनंद के साथ मेरी सुखी जिंदगी शायद आपको भी सुखी कर जाए।
कल्पना-- शायद।
चांदनी-- मुझे दुःख ही कल्पना, मैंने अनजाने में आपकी जिंदगी नष्ट कर की है और आपके लिए कुछ कर भी नहीं सकती सिवा ईश्वर से प्रार्थना के।
कल्पना-- (धीरे से) शायद यही मेरे काम आ जाये।


(दृश्य परिवर्तन)

चांदनी--(स्वगत भाषण) तो ऐसे थे विजय तुम। इतने आत्मकेंद्रित , और शायद इतने ही स्वार्थी भी। मैंने तो तुम्हें ऐसा नहीं जाना था विजय। क्या किसी प्रिये व्यक्ति को पहचानने के लिए किसी दूसरे की आखें जरुरी हैं? शायद। क्योकि मेरी मोहित दृष्टि कोतो तुम बड़े ऊँचे ,बड़े आदरनिये लगा करते थे। बहुत- बहुत तठस्थ हो कर देखा तो थोड़े अहंकारी दिखे , बस। लेकिन आज कल्पना की आँखों से देखा तो तुम तो बड़े छोटे दिखे विजय। इतने छोटे की तुम्हारा कद कल्पना से भी से छोटा हो गया। तुमसे तो मेरा आनंद न जाने कितना ऊँचा है। बड़ा अच्छा हुआ जो तुमसे एक मुलाकात हो गयी। नहीं तो न जाने कब तक मैं इस अफ़सोस में जीती कि कहीं तुम्हें छोड़ कर मैंने कोई गलती तो नहीं की? विधाता का लाख- लाख शुक्र है।
आनंद-- चांदनी।
चांदनी-- (चौंक कर) हाँ?
आनंद-- मैं आऊं ?

Saturday, May 29, 2010

(गतांक से आगे)
चांदनी-- अरे! तुम कब आये?
आनंद-- थोड़ी देर पहले । तुम अँधेरे में बैठी थी तो मैंने सोचा शायद तुम्हारी तबियत ठीक नहीं । इसलिए नाश्ता बना कर ले आया।
चांदनी-- अच्छा नहीं किया। दफ्तर से आते-आते जुट गए।
आनंद-- तुम भी तो दफ्तर से ही आई हो।
चांदनी-- तुमसे पहले आ गयी थी।
आनंद-- ओह, कम आन चांदनी! वैसे क्या बात है? तुम थकी- थकी सी दिखती हो। कोई विशेष बात?
चांदनी-- विशेष तो नहीं, यूँ ही एक छोटी सी बात है।
आनंद-- क्या?
चांदनी-- आज विजय से भेंट हुई, एक पेशेंट के रूप में।
आनंद-- वही विजय? तुम्हारे बचपन का दोस्त?
चांदनी-- हाँ।
आनंद-- क्या हुआ उसे?
चांदनी-- कार एक्सीडेंट हुआ है। राइट साइड बहुत ज्यादा इन्ज्योर्ड है। बांह डिस्लोकेट हो गयी है, घुटने में फ्रैक्चर है, दो पसली क्रैक कर गयी है, सर में भी चोट है। कुलमिला कर पोजीशन थोड़ी ठीक नहीं है।
आनंद-- ओह , तब तो चिंता की बात है । कर में अकेले थे ? साथ में कोई...
चांदनी-- पत्नी है। उसे हल्की चोटें हैं।
आनंद-- तुमने अच्छी ट्रीटमेंट तो दी है ना?
चंदनी-- अपनी और से तो हर संभव चेष्टा है।
आनंद-- चांदनी, तुम कभी यह मत सोचना कि तुम उसका स्पेशल केयर लोगी तो मैं कुछ अदरवाइज लूँगा।
चांदनी-- मैं जानती हूँ आनंद।
आनंद-- तुम उनकी अच्छी देख भाल करना। उन्हें यह महसूस नहीं होना चाहिए कि तुम बदल गयी हो, या तुम्हारे मन में कोई रंजिश है। आदमी बुरे दिनों में ही किसी के काम आता है।
चांदनी-- (कृतज्ञ स्वर में) थैंक यूं आनंद! तुमने मुझे एक भार से मुक्त कर दिया। मैं डर रही थी , कहीं मुझसे तुम्हारे प्रति कोई अपराध तो नहीं हो रहा।
आनंद-- (हंस कर) डोंट बी सिली चाँदनी। मेरा विश्वास इतना छोटा नहीं।
चांदनी-- आई लव यूं आनंद!
आनंद-- आई नो इट डार्लिंग!
चांदनी-- तुम मिलोगे उससे?
आनंद-- जरूर। लेकिन पहले उन्हें जरा ठीक हो जाने दो। अचानक तुम्हारे साथ मुझे देख कर उन्हें शायद अच्छा ना लगे।
चांदनी-- हो सकता है। वह पहले भी ऐसा ही था, संभव है अब भी नहीं बदला हो। (मूड बदल कर) छोड़ो हटाओ। काफी वक्त हो गया। बोलो रात के खाने में क्या खाओगे?
आनंद-- दैट्स लाइक अ गुड वाइफ।
(दोनों हंस पड़ते हैं)


(दृश्य परिवर्तन)
नर्स-- गुड मार्निंग डाक्टर।
चांदनी-- गुड मार्निंग सिस्टर। हाउ इज योर पेशेंट?
नर्स--- फाइन। वेरी को- ओपरेटिव।
चांदनी--(हलके से हंस कर) गुड।
कल्पना-- नमस्कार।
चांदनी-- नमस्कार। कैसे हैं आपके हसबैंड?
कल्पना-- पहले से काफी ठीक हैं। टांग कि प्लास्टर की वजह से थोड़े तंग हैं।
चांदनी-- थोड़ी परेशानी तो होगी ही। सो रहे हैं क्या?
कल्पना-- नहीं, जाग रहे हैं। मैं आपकी आवाज सुन कर निकल आई थी। आइये ना। (थोडा सा विराम)
चांदनी-- हैलो विजय!
विजय-- (विस्मय से) तुम?
चांदनी-- हाँ मैं। क्यों? कल्पना जी ने बताया नहीं था क्या?
कल्पना-- नहीं। मैंने बताया नहीं था। मैंने सोचा, आपको अचानक सामने देख कर जो ख़ुशी होगी, उससे इन्हें वंचित क्यों रखा जाये?
विजय-- सिली। ओरतें कितनी भी उम्र की क्यों ना हो जाएँ, उनका बचपना नहीं जाता।
चांदनी-- ओरतों का यह बचपना यदि ख़त्म हो जाये तो पुरुषों के जीवन से ख़ुशी का एक बड़ा जरिया ख़त्म हो जायेगा । वैसे तुमने मुझे मेरी आवाज से भी नहीं पहचाना था?
विजय-- नहीं। मेरा इस ओर ध्यान नहीं गया था। मैंने कभी आशा ही नहीं की थी कि तुमसे कभी ऐसे भी भेंट होगी।
चांदनी-- इसका मतलब तुम मुझे बिलकुल भूल गए थे। इट्स अ गुड साइन फॉर योर फैमिली लाइफ।
विजय-- बहुत जल्दी निष्कर्ष पर पहुँच गयी?
चांदनी-- यह एक सफल डाक्टर होने की निशानी है। वैसे तबियत कैसी है तुम्हारी? कैसा फिल कर रहे हो? कहीं पेन तो नहीं महसूस कर कर रहे हो ?
विजय-- थोड़ा। चोट है तो थोड़ी पीड़ा तो होगी ही ना?
चांदनी-- लेकिन एक्सीडें हुआ कैसे? तुम तो बहुत अच्छे ड्राइवर हो?
विजय-- गाडी स्पीड में थी। एक साइकिल वाले को बचाने में सड़क के किनारे उतर गयी ओर एक पेड़ से टकरा गयी। वैसे तुम कैसी हो?
चांदनी--(थोड़ा हंस कर) बहुत देर बाद ख्याल आया? वैसे मैं ठीक हूँ ओर मैंने कोई एक्सीडेंट नहीं किया है। (सब हंस पड़ते हैं) ये अच्छा हुआ कल्पना जी कि आप बिलकुल बच गयीं।
कल्पना-- मैं तो इनके ऊपर लद गयी थी, इसलिए मुझे कुछ नहीं हुआ। बस सर स्टेयरिंग से टकरा गया था इसलिए सर में थोड़ी चोट आ गयी। अ ..विजय, मैंने नारंगी की फांके निकाल दी हैं , आप खा लीजिये।
विजय-- चाँदनी, तुम जैसे निकला करती थी , वैसे ही निकाल दो।
चांदनी-- अरे!(असमंजस वाली हंसी) ।
कल्पना-- कैसे निकालती थीं भई?
चांदनी-- कुछ ख़ास नहीं, फांकों के छिलके उतार कर दाने निकाल दिया करती थी। वैसे ही निकाल दीजिये। खाने में सुविधा होगी। अरे राम! बहुत वक्त हो गया। मैंने वार्ड का राउण्ड तो लिया ही नहीं।
कल्पना-- लगता है सीधे यहीं चली आईं थीं।
चांदनी--हाँ, फिर बातों में वक्त का पता ही नहीं चला। अच्छा मैं चलती हूँ। कोई ट्रबुल हो मुझे खबर कीजियेगा। वैसे तो मैं खुद ही आती रहूंगी। अरे, आप क्यों उठ रहीं हैं?
कल्पना-- आपको छोड़ दूं। नर्स कहाँ चली गयी?
चांदनी-- इधर ही कहीं होगी, मैं भेज देती हूँ।
कल्पना-- चांदनी जी, एक प्रार्थना थी आपसे!
चांदनी-- प्रार्थना की बात है, कहिये ना?
कल्पना-- जब तक वो यहाँ हैं, आप उनकी देख -भाल डाक्टर चांदनी की तरह नहीं, सिर्फ चांदनी की कीजिये। मुझे उम्मीद है, इससे वो जल्दी अच्छे हो जायेंगे। आप समझ रहीं हैं ना?
चांदनी-- (धीरे से) समझ रही हूँ। और शायद वो भी जो आपने नहीं कहा। (कल्पना की लंबी सांस)


(दृश्य परिवर्तन)


आनंद-- आ तो गया हूँ मैं चांदनी लेकिन पता नहीं मिस्टर विजय मुझे देख कर कैसा फिल करें?
चांदनी-- तुमसे मिल कर किसी ने आजतक बुरा फिल किया है क्या?
आनंद-- सो तुम्हारे विजय बाबु कुछ अलग किस्म के व्यक्ति हैं ना।
चांदनी-- यह तुम कैसे जानते हो?
आनंद-- इसके लिए एक ही पहचान काफी है।
चांदनी-- कौन सी?
आनंद-- तुम्हारे पहलू में मेरा पाया जाना । (हंस पड़ता है)
चांदनी-- (नाराज हो कर) आनंद!
आनंद-- नाराज हो गयी? अच्छा बाबा, अब नहीं बोलूँगा।
चांदनी-- रूम नंबर २१। यही है उसका कमरा। पता नहीं सो रहा है या जाग रहा है। (दस्तक का स्वर) कल्पना जी...
कल्पना--(दूर से नजदीक आती आवाज) आइये। आइये ना। खुला हुआ है।
चांदनी-- सब ठीक है?
कल्पना-- इन्ही से पूछ लीजिये।
चांदनी-- हलो विजय। कैसे हो?
विजय-- पहले से ज्यादा बेहतर।
चांदनी-- इनसे मिलो, मेरे हसबैंड, मिस्टर आनंद। और आनंद, ये हैं विजय।
आनंद-- हलो । बहुत ख़ुशी हुई आपसे मिल कर। मैं आपके लिए बुके लाया हूँ, अपने बगीचे के फूलों से तैयार कर के। उम्मीद है आपको पसंद आएगा।
विजय-- धन्यवाद।
चांदनी-- इनसे मिलो आनंद, कल्पना जी , विजय की पत्नी।
आनंद-- ओह, नमस्कार। मैं तब से सोच रहा था विजय जी को अच्छा करने के लिए कहीं अलग से तो इतनी सुन्दर नर्स नहीं भेजी गयी है?
कल्पना--(हंस कर)धन्यवाद। बाते अच्छी कर लेते हैं आप।
आनंद-- आपको पसंद आई? चलिए इसी बात पर आपको कुछ देने का मन कर रहा है। लेकिन क्या दूं? विजय जी, आपके गुलदस्ते से एक फूल ले सकता हूँ?
विजय-- जरूर। आप पूरा भी ले सकते हैं।
आनंद-- नहीं, पूरा तो नहीं, सिर्फ एक लूगा। कल्पने जी , यह एक फूल आपे लिए।
कल्पना-- शुक्रिया, लेकिन मैं इसे रखूं कहाँ?
आनंद-- मैं एक अच्छी जगह बताऊँ?
कल्पना-- जरुर।
आनंद-- अपने बालों में लगा लीजिये। दिखियेगा, यह जो कमरा बीमार बीमार सा लग रहा है ना, एकदम से मुस्कुरा उठेगा।
चांदनी--(धमकी भरे स्वर में) आनंद, डोंट बी रोमैटिक।
आनंद-- सारी, मैं तो भूल ही गया था कि मेरी बीवी पास ही खड़ीहै। (चांदनी, कल्पना और आनंद की हल्की हंसी)
कल्पना-- बड़ी जल्दी भूलते हैं आप?
आनंद-- नहीं तो, जल्दी नहीं भूलता। वो तो बस आपको देख कर भूल गया था। मिस्टर विजय, आप नाराज तो नहीं हो रहे है ना?
विजय-- नहीं। अच्छा ही है , इन्हें भी अपने मन के लायक बातें करने वाला मिला। वैसे आप कांट्रेक्टर है क्या ?
आनंद-- जी नहीं, मैं इंजिनियर हूँ।
विजय-- चांदनी से कहाँ मुलाकात हो गयी आपकी?
आनंद-- यहीं, इसी हास्पिटल में। लीवर की बिमारी ले कर आया था। इस बीमारी के ठीक होते- होते दिल की बीमारी लग गयी।
चांदनी--(टोकते हुए) आनंद!
आनंद-- सारी। मैं बोर तो नहीं कर रहा आपको?
विजय-- नहीं, मैं सुन रहा हूँ आपको।
आनंद-- लेकिन मैं अब चलूँगा। आफिस को अच्छी देर हो चुकी है। इश्वर करे आप जल्दी स्वस्थ हो जाएँ। अच्छा कल्पना जी , चलता हूँ। बाई डियर।
चांदनी-- बाई।
कल्पना-- नमस्कार।
आनंद-- नमस्कार। सी यू अगेन।
(थोड़ी देर चुप्पी)
विजय-- तुमने बताया नहीं था।
चांदनी-- तुमने पूछा नहीं था।



(शेष फिर)