ऊब और दूब पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read uub aur doob in your own script)

Hindi Roman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam

Tuesday, April 7, 2009

एक काली लकीर

सोंधा-सोंधा महकता है बाबु
जब लौटता है खेलकर
धूल मिटटी और
पसीने में नहाकर।
डाल कर अपनी बाहें
मेरे गले में
झूल जाता है
आम के पेड़ में झूलते
टिकोले की तरह।
रगड़ता है अपने गाल
मेरी बांह से,
दिखाता है अपने छिले हुए घुटने।
दर्द कम हो कुछ उसका,
मैं चूम लेती हूँ उसका मुंह
और ठिठक जाती हूँ।
बस, कुछ दिन और,
फ़िर रुई की तरह नर्म
इस होंठ पे ,
उभर आएगी
एक काली लकीर,
जो धीरे-धीरे फैलती चली जायेगी
मेरे और उसके बीच में।

5 comments:

संजय तिवारी ’संजू’ said...

एक मां की बैचेनी बढ रही है कि अब मेरा बाबू बडा हो कर मेरे को प्यार करना भूल जायेगा
बडिया रचना है मार्मीक है

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बड़े होते बेटे को देखना माँ को ख़ुशी भी देता है पर उतनी ही शिद्दत से दूर जाने का एहसास का भी डर दिल में बैठने लगता है .अच्छा लगा आपका उसको कविता के रूप में कहना ...

संगीता पुरी said...

बहुत अच्‍छी रचना ।

Reality Bytes said...

माँ mummy

ajit.irs62 said...

sunder rachna