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Sunday, June 14, 2009

देह राग से परे

छुट्टी का एक दिन
मेरे साथ भी बिताओ जी!
नहीं, ऐसे नहीं।
देह राग से परे
सुनते हैं आज
कोई नया राग।
अच्छा, नहीं आता
तुम्हारी समझ में
ऐसा कुछ?
ठीक, चलो देख आते हैं
शहर की रौनक।
तुम्हे पसंद नहीं भीड़- भाड़?
मुझे भी कहाँ पसंद है।
चलो ,चलते हैं
किसी सूनी सड़क पर
जहाँ बिछे होंगे
पलाश के फूलों के लाल गलीचे।
मत करना दफ्तर की बातें
बच्चों के भविष्य की बातें भी नहीं
कुछ कहना तुम
अपने मन की,
कुछ कह लूंगी
मैं अपने दिल की।
अच्छा, नहीं बची है अब
तुम्हारे पास कोई बात
और सुन चुके हो मेरी भी बहुत!
चलो ठीक है,
कुछ नहीं बोलेंगे हम,
बस, चलते रहंगे
एक दूसरे का हाथ पकडे
और सुनेंगे,
गिरते पत्तों की ताल पर
बहती हवाओं का संगीत!
क्या कहा तुमने?
जब चुप ही रहना है
तो क्या बुरा है घर?
ठीक है फ़िर
तुम खोल लो टी वी
और मैं खोल लेती हूँ
फ़िर से आज का अखबार।
दिन ही तो काटने हैं,
कट जायेंगे!

15 comments:

Nirmla Kapila said...

vah sundar hai din hi to kaatane hain bahut gehare bhav aabhaar

श्यामल सुमन said...

सिर्फ दिन काटने तक तो बात ठीक है, लेकिन दिन सार्थकता के साथ कैसे कटे? अच्छे भाव,

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

sanjay vyas said...

जीवन के रोज़मर्रापन में आ आकर भटकने की विवशता को बढ़िया अभिव्यक्त किया है.

विवेक said...

बेहद खूबसूरत...

ओम आर्य said...

achchhi khwaahishe hai par aaj kal samay bilkul hi nahi hai insan ke paas ...........kyoki jindgi ki raftaar kafi badh gaye ..............sundar abhiwyakti

राज भाटिय़ा said...

क्या बात है. बहुत सुंदर

रंजना [रंजू भाटिया] said...

दिन ही तो काटने हैं,
कट जायेंगे!

अर्चना आपने इस रचना में आज का एक कड़वा सच लिख दिया है ..कल ही इस तरह का मैंने कुछ लिखा था अपनी एक सहेली से हुई बात पर ..कि वक़्त कहाँ कैसे कट रहा है ..यह कैसे बता सकते हैं ..आज जैसे आपने उस भाव को लफ्ज़ दे दिए ..सरल भाषा में कहती एक खूबसूरत रचना ..आपकी यह रचना मैंने सेव कर ली है बहुत बहुत सुन्दर ...देर से पढ़ी पर मिस नहीं करती आपके ब्लॉग पर कुछ भी पोस्ट किया हुआ ..क्यों की वह मुझे अपने ही दिल की बात लगती ही ..शुक्रिया

रंजना [रंजू भाटिया] said...
This comment has been removed by the author.
Vijay Kumar Sappatti said...

aapki ye rachna ek jeevant katha si hai .. bhaav itne sajeev hai ki bus kya kahe.. ye aaj ke daur ki haqiqat hai ..
is sajiv chitran ke liye aapko badhai ..

vijay
pls read my new sufi poem :
http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/06/blog-post.html

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

रचना बहुत अच्छी लगी....
आप का ब्लाग अच्छा लगा...बहुत बहुत बधाई....
एक नई शुरुआत की है-समकालीन ग़ज़ल पत्रिका और बनारस के कवि/शायर के रूप में...जरूर देखें..आप के विचारों का इन्तज़ार रहेगा....

PREETI BARTHWAL said...

बहुत ही बढ़िया लिखा है।।

batkahi said...

aj pahli bar apke blog par aya...DEH RAAG SE PARE kavita seedhi seedhi man ke andar utar janewali samanya par a-samanya kavita....rojmarra ki baton ya cheejon ko ham yun hi andekha kar dete hain par striyan aisa nahi karti,iska saboot mil gaya....ek baat,ap jis OOB ki baat karti hain apne ghoshnapatr me uska lesh matr bhi mujhe apke posts me nahi mila...shirshak par fir se gaur farmaiye

yadvendra

अर्चना said...

yadvendra ji,aapane shaayad kawita thik se nahin padhi. ye poori kawita jiwan ki ekrasata se utpnna oob ki hi to parichaayak hai.

प्रकाश गोविन्द said...

बहुत ही सुन्दर रचना !

कविता हो तो ऐसी ही ...
जो पाठक से सीधे संवाद स्थापित कर ले !


असर ऐसा कि पढ़ते ही
दिल में 'करेंट एकाउंट' खुल जाए !



शुभ कामनाएं

आज की आवाज

रंजना said...

AB kya kahun....80% dampaty ki katha hai yah.....Par samasya hai ki is chakravyooh ko ham swayan chunte hain aur usme fans tadfadate rah jate hain....