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Tuesday, July 7, 2009

कैसी हो तुम अब

उसे करनी होती हैं
बहुत सारी बातें
वह जब भी फोन करता है मुझे।
क्लास में मिले
किसी अच्छे कमेन्ट की,
ईर्ष्या से भरे
दोस्तों की प्रशंसाओं की,
कंधे पर टिके सर के
रेशमी बालों से
उठती खुशबुओं की,
अपनी महत्वाकांक्षाओं की,
बनते बिगड़ते योजनाओं की।
मैं चुप हो कर सुनती हूँ
आकाश में उड़ने को आतुर
उसके पंखों की आहटें ,
आशीषें देती हुई
हंसती रहती हूँ ,
उसकी बातों पर।
लेकिन शायद वह सुन लेता है
हँसी में दबी
मेरे अकेले पन की गूंज को,
आहिस्ता से उतर आता है
धरती पर ,
और पूछता है मुझसे ,
कैसी हो तुम अब?

5 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

bahut sundar bhav...

उठती खुशबुओं की,
अपनी महत्वाकांक्षाओं की,
बनते बिगड़ते योजनाओं की।
adbhut lineyen..

aapki kavita bahut achchi lagi
dhanywaad

ओम आर्य said...

बहुत ही इमानदारी से से लिखी है जिन्दगी का फल्सफा बहुत ही सुन्दर्

M VERMA said...

सादगी से पूछा गया प्रश्न --- उत्तर ज़रूर आयेगा

अनुराग अन्वेषी said...

बच्चे जिस तेजी से बड़े हो रहे होते हैं, उनके सपने उनसे ज्यादा तेजी से बड़े हो रहे होते हैं। हमारे सपने और हमारे बच्चों के सपने एक दूसरे से जुड़े होकर भी एक दूसरे से उतने ही जुदा भी होते हैं। पर जिस पड़ाव पर भी अपने सपने से उबर कर दोनों में से कोई भी एक, जब दूसरे पर निगाह डालता है तो दूसरों के सपने और दूसरों का यथार्थ जरूर सामने आ जाता है। अच्छी लगी यह कविता भी।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सही सच्ची बात को आपने बखूबी लिख दिया है अच्छी लगी आपकी यह रचना