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Sunday, March 15, 2009

नहीं कोई शिकायत नहीं

कितने गुमान भरे थे
वे दिन
जब मुझे था यकीन कि
बिछा दोगे तुम
अपनी हथेलियाँ
अगर तपती होगी जमीन
मेरे पैरों के नीचे।
लेकिन शायद थक गए थे तुम
मेरा यह विश्वाश
ढोते-ढोते।
कुछ प्राप्य भी तो नहीं था तुम्हें
सिर्फ़ एक विश्वाश का पाथेय
और जिन्दगी भर का सफर
इतना आसान नहीं था सब कुछ।
नहीं, कोई शिकायत नहीं,
दुःख भी नहीं है शायद,
हाँ, लेकिन याद तो
बहुत आती है तुम्हारी
जब तपती है जमीन
मेरे पैरों के नीचे।

7 comments:

अनिल कान्त : said...

मेरा यह विश्वाश
ढोते-ढोते। ........
वाकई बहुत गहरे मनोभाव हैं

संगीता पुरी said...

बहुत बढिया ...

नीरज गोस्वामी said...

बहुत गहरी संवेदनशील रचना...वाह...
नीरज

महामंत्री - तस्लीम said...

बहुत खूब।

Parul said...

beautiful!

रंजना [रंजू भाटिया] said...

हाँ, लेकिन याद तो
बहुत आती है तुम्हारी
जब तपती है जमीन
मेरे पैरों के नीचे।

सच्ची अच्छी कविता ... उन एहसासों का उन सवालों को आपने खूब अच्छे लफ्ज़ दिए हैं ..जो आपनी अनकही बात भी आसानी से कह गए हैं ..मुझे आपकी यह कविता अपने दिल के बहुत करीब लगी ..आपकी लिखी कविता मैं बहुत आराम से पढ़ती हूँ ..क्यों की उस में मुझे कहीं न कहीं अपनी बात की भी झलक दिखती है

अर्चना said...

meri kawitaon ko apne dil ke karib kahane ke liye bahut bahut shukriya ranjana ji.